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सुनिए मीर तकी मीर लिखी खास नज्म

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मीर तकी मीर उर्दू और फारसी भाषा के एक बहुत ही महान शायर थे। मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो। अहमद शाह और नादिर शाह के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को मीर तकी मीर ने अपनी आंखों से देखा था। इस त्रासदी की व्यथा उनकी रचनाओं मे दिखती है। अपनी गजलों के बारे में एक जगह उन्होने कहा था-

“हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने
  दर्दो गम कितने किए जमा तो दीवान किया”

इनका जन्म आगरा (अकबरपुर) मे हुआ था और उनका बचपन अपने पिता की देखरेख मे बीता था। उनके प्यार और करुणा के जीवन में महत्त्व के प्रति नजरिये का मीर के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा जिसकी झलक उनके शेरो मे भी देखने को मिलती है | पिता के मरणोपरांत, 11 साल की उम्र मे, इनके उपर 300 रुपयों का कर्ज था और पैतृक सम्पत्ति के नाम पर कुछ किताबें। 16 साल की उम्र में वह दिल्ली आ गए।

बादशाह के दरबार में 1 रुपया वजीफा मुकर्रर हुआ। इसको लेने के बाद वे वापस आगरा आ गए। फारस के नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के दौरान समसामुद्दौला मारे गए और इनका वजीफ़ा बंद हो गया। इन्हें आगरा भी छोड़ना पड़ा और वापस दिल्ली आए। इन्हें मालवा के सूबेदार के बेटे का मुसाहिब बना दिया गया। लेकिन एक बार फिर भारत पर आक्रमण हुआ। इस बार बारी थी अफगान सरगना अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) की। वह नादिर शाह का ही सेनापति था। पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठे हार गए। दिल्ली को फिर बरबादी के दिन देखने पड़े। लेकिन इस बार बरबाद दिल्ली को भी वे अपने सीने से कई दिनों तक लगाए रहे। अहमद शाह के दिल्ली पर हमले के बाद वह दरबार मे लखनऊ चले गये। अपनी जिन्दगी के बाकी दिन उन्होंने लखनऊ मे ही गुजारे।

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