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सुनिए निदा फाजली की आवाज में आज की नज्म !

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निदा फाजली हिंदी और उर्दू के बहुत बड़े और बहुत मशहूर शायर थें। उनका पूरा नाम मुक्तदा हसन निदा फाजली था। दिल्ली में पिता मुर्तुजा हसन और मां जमील फातिमा के घर तीसरी संतान नें जन्म लिया जिसका नाम बड़े भाई के नाम के काफिये से मिला कर मुक्तदा हसन रख दिया गया। दिल्ली कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड में इनके जन्म की तारीख 22 अक्टूबर 1938 लिखवा दी गई थी। उनके पिता भी बहुत मशहूर शायर थें। इन्होने अपना बाल्यकाल ग्वालियर में गुजारा जहां पर उनकी शिक्षा हुई थी। उन्होंने 1948 में ग्वालियर कॉलेज (विक्टोरिया कॉलेज या लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की थी।

उन्हें कम उम्र से ही लिखने का शौक लग गया था और वह कम ही उम्र से लिखने भी लगे थें। निदा फाजली इनका लेखन का नाम है। निदा का मतलब होता है स्वर/ आवाज/। फाजिला कश्मीर के एक इलाके का नाम है जहां से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फाजली जोड़ा था।

हिन्दू-मुस्लिम कौमी दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता पाकिस्तान में जाकर बस गए थे, लेकिन निदा पाकिस्तान न जाकर भारत में ही रहे थे। इतना ही नहीं वह कमाई की तलाश में कई शहरों में भी भटके थे। उस समय बम्बई हिन्दी/ उर्दू साहित्य का केन्द्र था और वहां से  सारिका जैसी लोकप्रिय और सम्मानित पत्रिकाएं छपती थीं तो 1968 में निदा काम की तलाश में वहां चले गए थे और धर्मयुग, ब्लिट्ज़ (Blitz) जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लग गए थे। उनकी सरल और प्रभावकारी लेखनशैली ने शीघ्र ही उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई। उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह 1969 में छपा था। आपको बता दें कि 8 फरवरी 2016 में निदा फाजली का देहांत हो गया था।

इसी मौके पर हमें निदा फाजली का एक बहुत अच्छा शेर याद आता हैं।

” घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो ये कर लें
  किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाएं।”

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