कभी घेरा विवादों ने तो कभी मिली प्रशंसा, ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद…

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कबीर के बाद मुंशी प्रेमचंद जी पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने सामाजिक दुर्व्यवस्था को अपनी लेखनी के माध्यम से उठाया। उन्होंने अपनी लेखनी में जाति, परिवारवाद, महिलाएं और मजदूरों की बात हमेशा उठायी है और इसका खामियाजा भी उन्होंने अक्सर भुगता है। उनकी कई किताबें सरकार द्वारा बैन कर दी गयी थी, लेकिन मुंशी प्रेमचंद जी ने कभी हार नहीं मानी और लिखना कभी भी बंद नहीं किया।

मुंशी प्रेमचंद जी 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास एक छोटे से गांव लमही में जन्मे थे। मुंशी प्रेमचंद जी का असल नाम “धनपत राय श्रीवास्तव” है लेकिन उसके बाद उन्होंने अपना “नवाब राय” रखा लेकिन बाद में उन्होनें अपना नाम प्रेमचंद रखा। “मुंशी” लिखने की सलाह उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने दी थी और इसी के साथ अपने साहित्य के सफर में उन्होंने अपना नाम मुंशी प्रेमचंद लिखने शुरु किया।

प्रेमचंद जी जब आठ साल के थे तभ उनकी मा का निधन हो गया था, लेकिन मुंशी जी के एक कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ में आनंदी का किरदार उनकी मां पर ही आधारित है।

गुमसुम और अकेले रहने वाले प्रेमचंद जी के किस्से कहानियों में हमेशा ही एक सुकून प्राप्त हुोता है। मुंशी जी अक्सर जिस तम्बाकू की दूकान में जाया करते वहां उन्होंने फारसी भाषा में लिखी कहानी, ‘तिलिस्म-ए-होशरूबा’ सुनते थे और यहीं से उनका कहानियों से नाता जुड़ गया।

मुंशी प्रेमचंद ने अपने करियर की शुरुआत एक किताब बेचने वाले लड़के के रूप में की थी जिससे वो अधिक से अधिक किताबें पढ़ने का मौका मिल सके और बाद में उन्होंने एक शिक्षक के रूप में दूसरों के घरो में जाकर बच्चो को भी पढ़ाया था, और फिर बाद में वो सरकारी विद्यालय में शामिल होकर शिक्षक बन गये थे और उसके बाद उन्होंने वाराणसी में एक प्रेस की शुरुआत की और जिसे “सरस्वती प्रेस” का नाम दिया।

मुंशी प्रेमचंद जी ने लगभग एक दर्जन उपन्यास, 250 कहानियां, निबंध और हिंदी में विदेशी साहित्य का बहुत कुछ अनुवाद किया था।

1907 में प्रेमचंद की पहला कहानी संग्रह, ‘सोज–ए-वतन’ (देश का मातम) प्रकाशित हुई। इस संग्रह में पांच कहानियां थीं। दुनिया का सबसे अनमोल रतन, शेख मखमूर, यही मेरा वतन है, शोक का पुरस्कार और सांसारिक प्रेम। हिंदी में उनकी पहली कहानी, ‘सौत’ 1915 में तथा पहला लघु कथा संग्रह, ‘सप्त सरोज’ 1917 में सरस्वती नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई।

विवादों से भरा रहा मंशी प्रेमचंद का जीवन-

एक महान रचनाकार होने के बावजूद भी प्रेमचंद का जीवन आरोपों से मुक्‍त नहीं था। प्रेमचंद के अध्‍येता कमलकिशोर गोयनका ने अपनी पुस्‍तक ‘प्रेमचंद : अध्‍ययन की नई दिशाएं’ में प्रेमचंद के जीवन पर कुछ आरोप लगाकर उनके साहित्‍य का महत्‍वता कम करने की कोशिश की। प्रेमचंद पर लगे मुख्‍य आरोप हैं- प्रेमचंद ने अपनी पहली पत्‍नी को बिना वजह छोड़ा और दूसरे विवाह के बाद भी उनके काफी महिलाओं से संबंध रहे थे।

पुरस्कार और सम्मान-

मुंशी प्रेमचंद जी की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया था। गोरखपुर के जिस स्कूल में वो शिक्षक थे, वहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना भी की गई थी।

आपको बता दें कि उनके बेटे अमृत राय ने “कलम का सिपाही” नाम से पिता की जीवनी लिखी है। उनकी सभी पुस्तकों के अंग्रेजी और उर्दू रूपांतर तो हुए ही हैं लेकिन इसी के साथ चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में भी उनकी कहानियां लोकप्रिय हुई हैं।

लोकिन जब जब वह अपनी उपन्यास “मंगलसूत्र” लिख रहे थे, तभी वह बीमार हो गए थे और लंबी बीमारी के चलते 8 अक्टूबर 1936 में उनका निधन हो गया। लेकिन उनके अंतिम उपन्यास “मंगल सूत्र” को उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया था।

 

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