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हां मैं एक विधवा मां हूं और S*X मेरी जरुरत है..

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कभी-कभी ऐसा होता है कि हम अपने जीवन में बहुत कुछ करना चाहते हैं जो हम चाहकर भी नहीं कर पाते। कभी तो हमें समाज की रूढ़िवादी सोच अपनी इच्छाओं को पूरा करने से रोक देती है तो कभी हमारा फर्ज हमें अपनी इच्छाओं का गला घोटने पर मजबूर कर देता तो कभी कुछ ऐसी परिस्थितयां होती हैं कि हमें खुद अपनी चाहत से मुंह मोड़ना पड़ता है। आज हम आपको कुछ ऐसी महिलाओं के बारें में बतायेंगे जो प्यार करने की चाहत तो रखतीं हैं लेकिन समाज और फर्ज की वजह से अपनी अंदरूनी ख्वाहिशों को कहीं दबा लेती हैं। आज हम आपको ऐसी ही महिला की कहानी के बारे में बताने जा रहे है जिसकी चाहत ही कुछ और है।

मैं हूं 40 साल की एक ऐसी विधवा जो असम के एक छोटे से जिले की रहने वाली है और जिसका 20 साल का एक जवान बेटा है। इसके बावजूद मेरी कुछ इच्छाएं हैं, मेरी भी कुछ उम्मीदें हैं, मैं भी ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ और मेरी भी कुछ ख्वाहिशें हैं कि मैं भी किसी के साथ अपनी खुशियां बांट सकू, किसी को अपना कहे सकू और उसके साथ प्यार कर सकू यानि कि अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति कर सकू लेकिन समाज की नजरों में ऐसी ख्वाहिश रखना एक विधवा के लिए किसी अपराध से काम नहीं होता। मेरे पिता कैंसर पीड़ित पुलिस अफसर थे और मेरी माँ एक गृहणी और मैं इनकी चौथी बेटी थी। मेरा बचपन काफी मुश्किलों से गुजरा है।

मेरे बचपन ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है और उनमे से जो सबसे बड़ी सीख थी वो ये थी कि इस रूढ़िवादी सोच के समाज में लड़की होना कभ-कभी कितना दर्द देता है। हम बहनों का एक छोटा भाई भी था जिसे हमारे माता पिता काफी प्यार करते थे। माता पिता के साथ-साथ सारे रिश्तेदार भी हमारे भाई को पसंद करते थें। हम बहनों को तो ये तक महसूस होता था कि कहीं हम अपने मां बाप की अनचाही औलाद तो नहीं जिसके चलते वो हमारे साथ कई बार ऐसा सुलूक करते है जिसे सह पाना कई बार मुश्किल होता था। लेकिन इन सबके बाद भी मेरे जीवन में कुछ लोग ऐसे थे जो मुझे मेरी जिंदगी जीने का हौसला देता थे और ऐसा सबक देते थे की चाहे जिंदगी में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आ जाये कामयबी की उड़ान भरने का हौसला टूटने मत दो। मेरे और मेरी बहनों के साथ बचपन में इतना कुछ हो चुका था की हमें छोटी सी उम्र में इस बात का एहसास हो गया था की चाहे कुछ भी हो पर हम बहनें आगे चलकर भविष्य में अपने बच्चों के लिए एक अच्छी माँ साबित होंगी।

सच बताऊं तो मैं कभी भी ये जान ही नहीं पाई की बचपन से जवानी तक का सफर और उस सफर का एहसास होता कैसा है? मैं बचपन के वो खुशनुमा पल कभी जी ही नहीं पायी जो मेरे साथ के बच्चों ने जिया है। मुझे न बचपन में पेंटिंग करने का बड़ा शौक था पर पिताजी का व्यवहार ही ऐसा था कि मैं कभी उनसे अपनी पेंटिंग कलर के लिए पैसे मांग ही नहीं पायी। हाँ, वो अलग बात है कि भाई के सुरक्षित भविष्य के लिए हमारे पिताजी एक-एक पैसे जोड़ते थे की आगे चलकर उनके लाडले को किसी भी तरह की मुश्किल का सामना न करना पड़े। मैंने और मेरी बहनों ने ये बात स्वीकार कर ली थी कि हम एक अमीर बाप की गरीब बेटियां है। लेकिन मेरी ज़िन्दगी का अंजाम इतना भी बुरा न था। एक ऐसा पड़ाव बाहें फैलाये इंतजार कर रहा था जो कि मुश्किलों से भरा था। कम उम्र शादी, नशेड़ी पति , बच्चा और अधूरी पढाई यही सारी चीजें थी जो मेरे आत्मविश्वास को तोड़ने के लिए काफी थीं। मुझे अपने बचपन का एहसास याद था कि चाहे कुछ भी हो जाये मैं एक अच्छी माँ बनूँगी।


यह मेरे लिए जिंदगी की असल जंग थी। मैंने कभी भी अपने पति से तालाक नहीं लिया क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे। और साथ ही एक अच्छी मां बनने के वादे ने भी मुझे रोक रखा था। लेकिन मैं अपने बच्चे को लेकर अलग जरूर रहने लगी। मैं एक नौकरी करके खाने पीने जितने पैसे जरूर कमा लेती थी। नौकरी के साथ-साथ मैं पढ़ाई भी करती थी और साथ में बच्चे की भी जिम्मेदारी अपने सिर पर लेकर जिंदगी बिता रही थी। मैंने कभी दूसरी शादी नहीं की क्योंकि कानूनी तौर पर तो मैं शादी-शुदा थी। लेकिन फिर मेरे गैर-जिम्मेदार पति की मौत हो गई और मैं विधवा बन गई।

मैं समाज के दिए हुए विधवा के धब्बे से भाग नहीं पाई लेकिन फिर भी मुझे सुकुन मिला और मुझे जरा भी शर्म महसूस नहीं हुई।”शायद यह सुनने में जरूर बुरा लग रहा होगा। लेकिन मेरी जिंदगी के उन गिरे हुए पलों ने मुझे ऐसा महसूस करने का हक दिया है। अब मैं वो 18 साल की लड़की नहीं हूं जो अपना दर्द, अपने ख्याल या फिर अपनी आवाज को उठा नहीं पाऊं। मै यहां ढोंगी समाज की शिकार नहीं होना चाहती। लेकिन अपने हक की मांग को लेकर लड़ने से मुझे कुछ हासिल नहीं होगा। आज में एक ऐसी विधवा हूँ जिसके लिए समाज ने अपनी ही अलग ही नीति बना रखी है कि मुझे पूरे जीवन भर किसी भी पुरुष से प्यार करने की इजाजत नहीं है और न ही संबंध बनाने की इजाजत है। मेरे नजरियें में तो शारीरिक सम्बन्ध बनाना सेहतमन्द होता है लेकिन इस समाज के नजरिये से देखा जाये तो किसी विधवा का किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना अपराध होता है। और इस दकियानूसी नजरिये से मेरा दम घुटता है। मुझे ये बात बार -बार परेशान करती थी कि मैं विधवा हूँ तो क्या हुआ ? क्या मेरी खुद की शारीरिक ज़रूरतें नहीं है, क्या मेरा खुद का कोई मन नहीं है?

जहां औरतों से लोग शारीरिक सम्बन्ध या उससे जुड़ी बातों पर बात करने से भी हिचकते हैं तो ऐसे में अपनी सोच को लोगों तक पहुंचाने में मुझे कितनी नफरतों से गुजरना पड़ता। लेकिन यह मेरे लिए एक जरूरत थी। मैं अपनी इस जरूरत को मना नहीं करूंगी और ना ही मैं करना चाहती हूं।एक समझदार और इज्जत करने वाले बेटे की मां होने पर मैं खुद को एक स्मार्ट और कामयाब सिंगल पैरेंट समझती हूं।

उम्मीद है ये सोसाइटी भी मुझे ऐसे ही अपनाएं। मैं आम पैरेंट्स से शायद ज्यादा कुशल हूं क्योंकि मैं पैरेंटिंग को समझती हूं। लेकिन मैं भी बहुत बार थकती थी लेकिन तब मैं खुद से किए वादों को याद करती थी।जब एक विधवा अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभा रही है तो भी क्या समाज को उसकी जिंदगी में दखल देना चाहिए? यह शायद सही समय है जब समाज अपनी मानसिकता बदले। विधवाएं और तलाकशुदा महिलाएं भी आम नागरिक हैं समाज से यही गुजारिश है कि खुद भी जिएं और उन्हें भी उन्के हिसाब से जीने दें।

यह कहानी हर उस महिला के लिए है जो सोचती है कि वो सोचने में गलत है। अगर आप सब कुछ अपने परिवार के लिए कर रहे हैं तो जरूरत नहीं है सोचने कि“लोग क्या कहेंगे”। यह समय है कि आप अपने लिए जिएं ना कि इस बात के लिए कि समाज कैसे जी रहा है।

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