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तो इस बार इंसानों के कटघरे में भगवान

राम मंदिर.. बहुत सुना है न? यहीं वो मामला है जिसमें कई लोगों की जान जा चुकी है। राम मंदिर के बारे में बात सभी लोग करते है लेकिन आखिर राम मंदिर बनेगा कैसे ये कोई नहीं सोचता। अगर आप गंभीरता से सोचे अगर सरकार को राम मंदिर की चिंता होती तो सुप्रीम कोर्ट में यह मामला इतना लंबा खिचता ही क्यों? कहीं न कहीं ऐसा भी दिख रहा है कि सरकार इस मुद्दे को अपना वोटबैंक बनाने के लिए हमेशा जिंदा रखना चाहती है। आज हम आपसे इसी विवादित मामले पर बात करने जा रहे है, काफी मुश्किल है इस मामले पर बात करना क्योंकि इस मामले कर कोई पढ़ना नहीं चाहता सब लड़ना चाहते है।

164 साल पुराने इस राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद को करीब 25 साल पूरे हो चुके हैं। यह मामला दोबारा सुर्खियों में तब आया जब 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 7 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई। इस बीच राम मंदिर आंदोलन के लिए बीजेपी के वरिषठ सांसद सुब्रमण्यम स्वामी, आध्यात्मिक नेता श्री श्री रविशंकर और शिया वक्फ बोर्ड के प्रमुख वासीम रिजवी नए पैरोकार के रूप में उभरे हैं, जो बार-बार दावा कर रहे है कि सभी सबूत, रिपोर्ट और भावनाएं मंदिर के पक्ष में हैं। बस फिर क्या था तथाकथित कट्टर हिंदू होने का दावा करने वालों को लड़ने के लिए एक और मामला मिल गया।

पर आज भी एक सवाल लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर राम जन्म भूमी अयोध्या में बाबरी मस्जिद क्यों बने? इस मामले को देख ऐसा नहीं लग रहा कि कहीं न कहीं हम जाने अनजाने अपने भगवान श्री राम को कटघरे में खड़ा कर रहे है। क्यों इस मामले को इतना लंबा खींचा जा रहा है? एक बात पर आप खुद विचार कीजिए बाबरी मस्जिद बाबर के नाम पर बनाई गई थी। लेकिन क्या बाबर भगवान थे नहीं न? सिर्फ एक मामूली इंसान था और राजा था फिर क्यों बाबर की तुलना भगवान मरीयादा पुरुषोतम श्री राम से की जा रही है। क्यों भगवान का स्तर इतना गिराया जा रहा है।

शायद इसका जवाब आप लोगों के पास नहीं होगा। लेकिन जहां तक मेरा ख्याल है सभी लोग धर्म की आड़ में गुंडागरदी करना चाहते है जिसके लिए उन्हें किसी भी तथ्य की जरुरत नहीं है जरुरत है तो सिर्फ मंदिर और मस्जिद एक नाम की। आपको एक बात याद दिलाता हूं, मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुसलमीन और एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने दो साल पहले 6 दिसंबर के दिन खुले मंच से एक चुनौती जारी की थी कि अयोध्या में राम मंदिर नहीं बल्कि बाबरी मस्जिद फिर से एक बार बनेगी।

ओवैसी का कहना था कि हमें हिंदुस्तान के संविधान पर और हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट पर पूरी तरह से भरोसा है और फिर ओवैसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को सीधे संबोधित किया और कहा, “तुम जो मंदिर बनाने का ख्वाब देख रहे हो हिंदुस्तान की अदलिया (न्यायपालिका) उसे इंशा अल्लाहोताला पूरा नहीं करेगी।” लेकिन यह बात तो खुद ओवैसी भी अच्छे से जानते हैं कि वो चाहे कितना भी जोश भरा भाषण क्यों न दें, बाबरी मस्जिद को फिर से बनाने का संकल्प तो दूर कोई भी पार्टी या कोई नेता ऐसी किसी चर्चा के आसपास भी भटकना पसंद नहीं करेगा। फिर चाहे वो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव हो या फिर कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी, प्रकाश करात ही क्यों न हो।

एमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी ये ख्वाब देख रहे है कि बाबरी मस्जिद बनेगी और वो संघ परिवार के उग्र हिंदुत्व का काउंटर तैयार करना चाहते हैं। शायद इसी वजह से सीधे सीधे सरसंघचालक मोहन भागवत को चुनौती देते रहते हैं। पर क्या ओवैसी ये बात नहीं जानते कि उनकी इस चुनौती से सरसंघचालक भागवत चिढ़ने या कुपित होने की बजाए अपनी झबरी मूछों के नीचे मुस्कुराते होंगे? इस मामले को ज्यादा तूल न दिया जाए तो ही बहतर है और भगवान को इंसान के बराबरी पर न रखा जाए तो शायद शांती से यह मामला सुलक्ष जाएगा। बाबर में और भगवान श्री राम में जो अंतर है उसे भी बरकरार रखने की जरुरत है स्तर इतना नींचे न ही गिराया जाए कि भगवान को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए। वरना राम मंदिर तो दूर की बात है विनाश होने में भी समय नहीं लगेगा। इन चार लाइन के साथ अपनी बात यहीं पर खत्म करूंगा।

 

                                                                                               “अरे ओ अल्लाह वालो अरे ओ राम वालों
                                                                                                 अपने मजहब को सियासत से बचालो
                                                                                                 मंदिर मस्जिद कभी फुरसत में बना लेना
                                                                                                 जो टूटे हैं घर नफरत में उनको तो बनालो”

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