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किस हक से आप शहीदी दिवस मनाते हो जब आपके दिल में नहीं भगत सिंह…

क्या आप कभी भगत सिंह बनना चाहेंगे…क्यों किसी को भगत सिंह ही बनना चाहिए… क्या हम भगत सिंह को जानते है… कोई भगत सिंह कैसे बनता होगा… फांसी पर चढ़ जाने से या अपने विचारों की यात्रा से? हर कोई 23 मार्च के दिन भगत सिंह को याद करना शुरु कर देगा और उनके किस्से गाएगा, ट्वीट करेगा या फिर कोई पंक्तियां पढ़ेगा। उनसे सवाल पूछिये कि क्या आपके दलों में किसी भी नौजवान के लिए भगत सिंह बनने का अवसर हैं..? किसी भी दल में ऐसा नेता है जो अपनी सोच से भगत सिंह के आस-पास भी हो…? भगत सिंह की एक तस्वीर को ट्वीट कर देना… वाट्सएप पर मैसेज शेयर कर याद किया जाता है। लेकिन क्या ये पर्याप्त है…? कई स्थानों पर भगत सिंह की पीली पगड़ी में तस्वीरें देखने को मिलती है… जबकि भगत सिंह ने कभी पीली पगड़ी पहनी ही नहीं।

हर जगह भगत सिंह की प्रतिमा पर फूल माला चढ़ाया जाता है। और कहा जाता है कि वो एक प्रेरणा हैं लेकिन अगर ऐसा है तो कोई दूसरा भगत सिंह क्यों नहीं पैदा हुआ? दुकानों पर भगत सिंह का पोस्टर छपा टी-शर्ट बिकता है। युवा खरीदते है और पहनते है। सीने पर भगत सिंह की तस्वीर दिखाई देती है लेकिन इनमें से कितने लोगों ने भगत सिंह को अपने दिलों में बसाया हैं। बॉलीवुड में भगत सिंह के जीवन के ऊपर कई फिल्में बनी। जिसमें भगत सिंह को एक जोशिला और क्रांतिकारी हीरो दिखाया गया। आज भगत सिंह को समझने की जरूरत है। आज हर राजनीतिक दल भगत सिंह को अपना लेता हैं। लेकिन सोचिए कि अगर वो जिंदा होते तो कौन सा दल उन्हें अपने यहां पद देता और कौन सा पद देता?

“जो चीज आजाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती, उसे समाप्त हो जाना चाहिए- भगत सिंह”

ये भगत सिंह की लाइन हैं। नौजवान भारत सभा का लाहौर घोषणा पत्र का हिस्सा है। यही बात आज अगर कोई छात्र नेता कहता है तो आप क्या करेंगे… उसके ऊपर देशद्रोह का केस दर्ज करेंगे या उसे भगत सिंह का दूत समझकर माला पहनाएंगे? भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा का लाहौर घोषणा पत्र में कहा था कि “दुनिया के नौजवान क्या-क्या नहीं कर रहे हैं और हम भारतवासी, हम क्या कर रहे हैं… पीपल की एक डाल टूटते ही हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं चोटिल हो उठती हैं… बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों के ताजिये नामक कागज के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता है और फिर वो नापाक हिंदुओं के खून से कम किसी वस्तु से संतुष्ट नहीं होता। मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए लेकिन यहां भारत में लोग पवित्र पशु के नाम पर एक दूसरे की जान लेने पर उतारू हैं। -भगत सिंह

ये 1928 की बात है लेकिन इसे आप 2018 में भी समझ सकते हैं। आप बताईए ये बात कहते हुए कौन सा भगत सिंह आज की कौन सी पार्टी में रह सकता है। क्या भगत सिंह की टी-शर्ट पहनने वाले भगत सिंह को दिल से सोचते हैं। क्या कोई नौजवान किसी पार्टी की कार्यकारिणी बैठक में ये कहते हुए प्रवेश कर सकता है कि धर्मों ने हिंदुस्तान को बर्बाद कर दिया है।

साल 1928 में भगत सिंह ने एक बात कही थी कि “इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय भारत के नेताओं मे ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा उठाया था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मांन्धता के बहाव में बह चले हैं।”

साल 1928 का वो साल था हिंदू मुस्लिम दंगे हो रहे थे। तब भगत सिंह की उम्र क्या रही होगी। उनकी पूरी जिंदगी 23 साल चंद महीने थी। कैराना को कश्मीर बताने वाली मीडिया के बारे में भगत सिंह 1928 के साल में ही कह गए हैं। वो लिखते है कि “दूसरे सज्जन जो सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं वो अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था, आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि भारत का बनेगा क्या?” ये बात भगत सिंह ने 1928 में कही, जब टीवी मीडिया नहीं हुआ करता था।

देश में जयंती और पुण्यतिथि की बाढ़ आ गई है। ये समझना मुश्किल हो गया हैं कि कल किसी की जयंती पर जो नेता किसी को अपना प्रेरणा बताया था वही आज भगत सिंह को अपना प्रेरणा बता रहा है। फिर वो किसी और की जयंती पर अपनी प्रेरणा किसी और को बताएगा। जब इतने महान पुरुषों से हमारे नेता प्रेरणा पा रहे हैं फिर तो हम किसी राजनीति की स्वर्ण युग में जी रहे हैं। क्या भगत सिंह होना इतना आसान है। अभी लेनिन का मामला उठा तो तब लेनिन की पूरी देश में मूर्तियां तोड़ी गई क्या ये बात सही है कि जिसे आप अपना आदर्श कहने वाले हैं और उस शख्स का जो आदर्श था उसकी मूर्तियों को आप नुकसान पहुंचाएं।

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