BLOG: अमित शाह जी क्या नोट बंदी पर लोकतंत्र में सवाल करना गलत हैं?

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देश में 500 और 1000 रुपये की नोट को बंद करने के बाद मोदी सरकार ने नए नोट जारी कर दिये। मोदी के इस फैसले को बीजेपी ने काला धन के खिलाफ सर्जिकल अटैक बताया। वहीं कई विपक्षी पार्टियों ने इसे जनता की पेरशानी बढ़ाने का फैसला बताया। अमित शाह ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस कर विरोध करने वाली पार्टियों के खिलाफ जमकर हमला बोला और कहा कि जनता नोट बंदी की फैसले से खुश हैं तो राजनीतिक पार्टियों को क्या दिक्कत हो रहीं हैं।

शाह जी को आश्चर्य हैं कि कुछ राजनीतिक पार्टिया भी सवाल कर रहीं हैं। अब की सांसद और तब के बीजेपी नेता मीनाक्षी लेखी ने जनवरी 2014 में कांग्रेस के उस फैसले का विरोध किया था जिसमे मनमोहन सरकार द्वारा काला धन के खिलाफ 2005 के नोटों को गैर कानूनी घोषित किया गया था। मीनाक्षी लेखी ने तब बिलकुल वहीं बाते कहीं थी जो अब विपक्ष में कांग्रेस और बाकी पार्टिया कर रहीं हैं। फिर ये दोहरा चेहरा क्यों?

अमित शाह जी आप के अनुसार राजनीतिक पार्टियों को मोदी सरकार के फैसले पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। सोशल मीडिया पर तो बीजेपी समर्थक ये तक कह रहे हैं कि ‘जो लोग नोट बंदी के फैसले का विरोध कर रहें हैं उनके पास या तो काला धन हैं या फिर वो देशद्रोही हैं’। शाह जी क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सवाल करना गलत हैं ? जब कोई सवाल नहीं कर सकता तो फिर ये लोकतंत्र कैसा ? शाह जी, राजनीतिक पार्टिया देश की पीएम नरेंद्र मोदी का विरोध नहीं कर रही बल्कि नोट बंदी के फैसले से होने वाले परेशानियों पर सवाल उठा रही हैं। इसमें आम आदमी भी शामिल हैं जो अपना जीवन-यापन के लिए काम-धंधा छोड़कर 3-3 घंटे लाइन में लग रही हैं और ये तक भरोसा नहीं हैं की उसका नंबर आने तक बैंक में पैसे मिलेंगे भी या नहीं। किसी की शादी रुकी हुई हैं तो किसी का अंतिम संस्कार।

आप कह रहे हैं कि आम आदमियों को कोई दिक्कत नहीं होगी लेकिन जरा इनपर गौर करें। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में कथित तौर पर हॉस्पिटल द्वारा 1000 का नोट लेने से इनकार करने की वजह से एक मरीज की मौत हो गई। क्योंकि मरीज के परिजन छोटी नोट का इंतजाम नहीं कर सके। वहीं तेलंगाना के महबूबाबाद में रहने वाली एक महिला ने इसलिए सुसाइड कर लिया क्योंकि उसके घर में 54 लाख के 500 और 1000 के नोट रखे हुए थे। नोट बंद होने के बाद महिला को लगा कि ये नोट अब कागज के टुकड़े हो गए हैं।

शुक्रवार को 10 साल के एक बच्चे ने बीमारी से तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया। बच्चे के पिता ने बताया कि उनका बेटा 3 दिन से बीमार था, लेकिन 1000 रुपये का चेंज नहीं होने के कारण ऑटो चालक ने उसे हॉस्पिटल ले जाने से इनकार कर दिया। वहीं कुशीनगर के कप्तानगंज के पास एक 60 साल की महिला की मौत हो गई जब वो 1000 के दो नोट बदलवाने बैंक पहुंची थी। कथित तौर तभी किसी ने कह दिया कि ये नोट अब कागज के टूकड़े हो गए हैं।

उधर बुलंदशहर के खुर्जा के रहने वाले अभिषेक का कहना है कि वो अपनी पत्नी एकता की डिलीवरी के लिए निजी अस्पताल कैलाश गया था। अस्पताल वालों ने उससे 10,000 रुपए जमा कराने के लिए कहा था। अस्पताल वालों ने 1000 के नोट देखकर पैसे लेने से मना कर दिया। इस पर अभिषेक अस्पताल वालों से मिन्नतें करने लगा कि वो बाद में बदल कर ला देगा फिलहाल इसे जमा कर लिया जाए। अभिषेक के मुताबिक अस्पताल ने एक नहीं सुनी और पत्नी की डिलीवरी में देरी की वजह से उसकी बच्ची की मौत हो गई।

शाह जी इन मौतों को छोडिए। जनता तो खुश हैं। नोट बंदी से देश में व्यापार ठप हैं जिनका लेन देन कैश में होता था। देश में आबादी का बड़ा हिस्सा नकदी पर निर्भर रहता है और उसे बैंकिंग सुविधा सुलभ नहीं है। काम में मंदी सी छाई हुई हैं। ATM की मशीनों में दो दिन बाद भी पैसा नहीं पहुंचा। क्या बैंकों के बाहर लगने वाली लंबी-लंबी लाइनों में कोई ब्लैक मनी रखने वाला दिख रहा है ?

जिनके पास काला धन या भ्रष्टाचार का पैसा हैं वो नोटों को कूड़े में फेंक रहें हैं। कोई लाखों- करोड़ों रुपया जला रहा हैं तो कोई गंगा नदी में बहा रहा हैं। उनका नुकसान हुआ ठीक हैं। गलत पैसा बाहर आया ठीक हैं। लेकिन क्या ये पैसा सरकार के पास पहुंचा? नहीं।

शाह जी लोग ये नहीं कह रहें कि मोदी सरकार का फैसला गलत हैं। काला धन पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन ऐसे कदम उठाने से पहले गुप्त रूप से ही सही व्यवस्था कर देनी चाहिए थी ताकि जनता को परेशानी ना होती। जैसे की मार्केट में 100 के नोट को ज्यादा सर्कुलेट कर देना चाहिए था। बाकि नोट बंदी पर कई सवाल किए जा सकते हैं। लेकिन नोट बंदी मुख्य रूप से काला धन के खिलाफ किया गया था। इसलिए काला धन पर बात करते हैं।

आयकर विभाग के मुताबिक ब्लैक मनी का सिर्फ 5-6℅ ही कैश में होता है। बाकी, शेयर, बॉन्ड, ज़मीन, सोना वगैरह में होता हैं। यानि 94℅ कालाधन खुश होगा इस वक्त। बचे हुए 6℅ का 10℅ पकड़ने के लिए सरकार ने देश की जनता को कतार में खड़ा कर दिया। सीधा मतलब कि सरकार ने 94℅ ब्लैकमनी पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

दूसरी ओर मान लीजिए किसी ने अपने तहखाने में दो हजार करोड़ रुपए रखा हुआ है। मान लेते हैं कि उसके सारे पैसे सरकार ने जब्त कर लिए। तो, उसका क्या बिगड़ेगा? जो आदमी दो हजार करोड़ नकदी रख सकता है वो फिर से दस हज़ार करोड़ रुपए बनाने की क्षमता रखता है। व्यवस्था ही ऐसी है।

हमारी रूरल (देहाती) इकोनॉमी कैश इकोनॉमी है। वहां न एटीएम चलता है, न पेटीएम। न क्रेडिट कार्ड और न ही चेक। गांव-देहात में लोगों की ‘छोटी बचतों’ ने ही 2008 के मंदी में इकोनॉमी को उबारा था। आज भी देहातों में 25-30 किलोमीटर तक न बैंक है, न ATM। जब दिल्ली में लोग तीन दिनों से बैंक का चक्कर काट रहे हैं तो देहातों को क्या हाल होगा? इस दौरान परिवार का एक सदस्य फुल टाइम ‘कैश एक्सचेंज’ और डिपॉजजि में लगा रहेगा, सारा काम-काज छोड़ कर।

एक मजदूर की रोजाना की कमाई पांच सौ रुपए है। कालाधन उसके पास शून्य है। घर में पांच-पांच सौ के चार नोट पड़े थे। उसका पूरा दिन बैंक में नोट बदलने में बर्बाद हो गया। उसकी एक दिन की दिहाड़ी का नुकसान कौन देगा। उसकी क्या गलती थी?

रिजर्व बैंक ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 57 लोगों ने बैंकों के 85 हज़ार करोड़ रुपए दबा रखा है। सरकार को इन 57 लोगों की गर्दन मरोड़नी चाहिए। हल्ला भी कम मचता। ब्लैक मनी जब्त कीजिए लेकिन जो कदम आसान था पहले वो उठाइए।

हाल ही में पनामा पेपर लीक में कई भारतीयों और उनके कंपनियों के नाम आए थे। पनामा के बाद बहमास लीक आया था जिसमें 475 भारतीयों से जुड़े एकाउंट का नाम सामने आया थे। उस पर क्या कार्रवाई हुई ? इससे पहले अंतरराष्ट्रीय खोजी वेबसाइट विकीलीक्स ने स्वीस बैंक में भारतीयों के 628 एकाउंट हाल्डरों के नाम का खुलासा किया था। उस पर क्या कार्रवाई हुई ?

चुनाव से पहले आपके नेताओं द्वारा विदेशों में पड़े ब्लैक मनी के आकड़े बताये जाते थे जो कई लाख करोड़ों में होते थे। उसमें से कितना आया? दो साल हो गए जनता को बताएंगे क्या ?

साधारण सा सवाल हैं। अगर किसी के पास 10 करोड़ रूपया होगा तो क्या वो घर में रखेगा या अपने काले कमाई को शेयर मार्केट, रियल इस्टेट, और सोना खरीद कर काले धन सफेद करेगा। शाह जी इस फैसले से बड़ी मछली हाथ में नहीं आने वाली हां कुछ छोटी मछलियों को पकड़ने में कामयाब जरूर हो सकते हैं। लेकिन जितना आम जनता और व्यापार को नुकसान हो रहा हैं जिसमें बॉलीवुड भी शामिल हैं। वो आपके छोटी मछलियों से ज्यादा ही है।

हाल ही में रिटायर्ड हुए RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि नोट बैन कर देने से कालेधन पर लगाम लग जाएगी। उन्होंने कहा कि नोट बैन होता है तो कालाधन रखने वाले लोग उससे निकलने के लिए भी रास्ते निकाल लेते हैं। लोग काले धन को सफेद करने के कई तरीके जानते हैं। उन्होंने कहा था कि कालेधन पर लगाम लगाने के लिए लोगों पर लगने वाले टैक्स के बारे में हमे सोचना चाहिए।

शाह जी लोकतंत्र में स्वस्थ बहस होनी चाहिए और सत्ता से सवाल-जवाब ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती हैं।

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