BLOG: जहां किसी की सुनवाई नहीं होती, वहां सुनता है सोशल मीडिया

“हमारा झण्डा इसलिए नहीं फहराता कि हवा चल रही होती है, ये हर उस जवान की आखिरी सांस से फहराता है जो इसकी रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देता है।” – भारतीय सेना

 

जब हम चैन की नींद सो रहे होते हैं तो वो घर से दूर हमारी रक्षा कर रहे होते हैं। जब हम त्यौहारों का जश्न मना रहे होते है, तो वो जान हथेली पर लिये सीमा पर दुश्मनों से लोहा ले रहे होते हैं। बारिश हो या गर्म हवा या हो ठंड की कपकपाहट, वो सब भूल सीने में भारत माता की रक्षा के लिए जुनून लिये होते हैं। हमे नाज है अपने वीरों पर, जो भारत की शान के लिए शहीद हो जाते हैं।

 

ऊपर कही गई लाइने जीतना सच है उतना ही ये भी सच है कि इन सैनिकों को मजबूरन अपने बड़े अफसरों के जूते साफ करने, कपड़े धुलवाने से लेकर कुत्ते घुमाने तक उन्हें व्यक्तिगत काम करना पड़ते हैं। जिन जवानों को अच्छी खुराक चाहिए, अच्छी सुविधाएं चाहिए उन्हें सुखी रोटी और दाल तक ठीक से नसीब नहीं हो रहे। ये बातें खुद सेना के जवान कह रहे हैं। एक बाद एक सेना के जवानों का 5 वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद से मोदी सरकार से लेकर सेना के आलाकमान तक में हड़कंप मच गया। क्योंकि इन जवानों ने सेना में भ्रष्टाचार और बड़े अफसरों की तानाशाही की पोल जो खोल दी।

 

सोशल मीडिया को सैनिको ने क्यों बनाया अपना नया हथियार-

सोशल मीडिया एक ऐसा मंच है जहां सभी को अपनी बात रखने के लिए आजादी है। कई सारे मुद्दे मीडिया नहीं दिखाती है तो वो सोशल मीडिया के सहारे सबके सामने आ जाती है। न्यूज चैनलों ने कई बार सैनिकों के ऊपर बनाए गए शो में उनकी वीरता और शौर्य का गाथा दिखाई जाती है। लेकिन सैनिकों को हो रही समस्यों पर कभी कोई शो बनाकर मीडिया ने मुद्दा नहीं उठाया। दरकिनार करने का आलम ये हुआ कि सैनिकों ने अपनी आवाज पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाना मुनासिब समझा। जिससे जवानों को दो फायदे हुए। पहला ये कि किसी खास अखबार या चैनल में गुहार लगाने के बजाय उनकी कहानी सोशल मीडिया के सहारे कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंच गई। दूसरा ये कि जवानों को ये उम्मीद भी रही होगी कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर शिकायत करने के बाद सोशल मीडिया के लोग उनके ढाल की तरह काम करेंगे।

 

हाल ही में आर्मी के जवान और अर्धसैनिक बलों के कुछ जवानों ने सोशल मीडिया के जरिए अपने दर्द को बयां किया था। बीएसएफ के जवान तेजबहादुर यादव ने सैनिको को मिल रहे खराब खाने की शिकायत करते हुए सोशल मीडिया पर खाने के साथ वीडियो शेयर किया। जिसके बाद वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। बढ़ता मुद्दा देख मीडिया में बहस शुरू हो गई कि क्या भारतीय सैनिकों को इस हालत में अपनी ड्यूटी करनी पड़ती है। पहला वीडियो आने के बाद फौजियो को मिलने वाले खाने की गुणवत्ता को लेकर चर्चा अभी शुरू ही हुआ कि एक और ऐसा वीडियो आ गया। सीआरपीएफ में कार्यरत कॉन्सटेबल जीत सिंह ने सोशल मीडिया पर अपना वीडियो डाला, जिसमें उन्हें मिलने वाली सुविधाओं की कमी और सेना-अर्धसैनिक बलों के बीच भेदभाव की बात कही गई थी। ऐसा लग रहा था 2 वीडियो काफी सरकार का ध्यान खींचने के लिए काफी होगा तभी सोशल मीडिया पर तीसरा वीडियो वायरल हो गया। इस वीडियो में भारतीय सेना के जवान लांस नायक यज्ञ प्रताप सिंह ने आरोप लगाया कि अधिकारी, जवानों का शोषण करते हैं। इसके बाद भी दो और वीडियो सामने आई थी। इन सभी वीडियो में दो बातें एक जैसी थीं कि जवान शिकायत कर रहे थे दूसरा ये कि इन सैनिकों ने अपनी शिकायत कुछ खास अफसरों, नौकरशाहों या नेताओं तक ना पहुंचाकर आम जनता तक पहुंचाईं। इन सभी ने सोशल मीडिया को अपना नया हथियार बनाया।

 

सोशल मीडिया बना पावरफुल-

सोशल मीडिया शुरू से पावरफुल था। सोशल मीडिया पर गैर-विवादित बातें ज्यादा होती हैं जिस वजह से हम उसकी ताकत का सही आकलन नहीं लगा पाते। लेकिन जब लोग सोशल मीडिया पर उसे शिकायत या विवादित मुद्दों पर चर्चा के लिए टूल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तब अंदाजा होता है कि सोशल मीडिया कितनी मजबूत है।

 

इस टूल को पहली बार ऐसे लोगों (सेना के जवानों) ने इस्तेमाल किया जिसे देश का गर्व समझा जाता है। इन वीडियोज को देखकर दिल भी दुखा कि हमारे जवान तकलीफ में क्यों है, जबकि हम उनके लिए टैक्स देते हैं। फिर भी उन्हें वो सुविधा नहीं मिल रहा, अच्छा खाना नसीब नहीं हो रहा। क्या ये बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है?

 

यहां एक पेंच यह भी है कि देश की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों से जुड़े रहने के कारण सेना के जवानों के लिए अनुशासन से जुड़े सख्त नियम होते हैं। जिस वजह से शिकायत करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना कहीं ना कहीं इन नियमों का उल्लंघन है। अगर ये वीडियो बनाकर शिकायत करने का ये चलन जारी रहा, तो मुश्किल हो जाएगी। इतनी बड़ी फौज में अगर हजारों जवान सोशल मीडिया पर अपनी शिकायत करने लगे तो अनुशासन बनाए रखने में मुश्किल हो सकता है। लेकिन सवाल ये है कि शिकायत करने के जो विकल्प मौजूद हैं, उसे इस्तेमाल किया गया या नहीं। या फिर जवानों ने सोचा कि कोई सुनता नहीं, तो चलो सोशल मीडिया पर डाल देते हैं।

 

लेकिन जब बात सेना की जवानों की तकलीफ कि हो तो इन दलीलों का कोई मतलब नहीं रह जाता। कोई भी नकारात्मक बात किसी संस्था में होती है तो वहां हम नियमों और उसूलों की बात करने लगते हैं। उसूल तो ये भी है कि जवानों को खाना मिलना चाहिए था, फिर उन्हें क्यों नहीं मिल रहा। जब सेना के बड़े अफसर जवानों की फिक्र नहीं कर रहे हैं, तभी तो शिकायत की जा रही होगी। सोशल मीडिया पर आए इन वीडियो को देखकर दुख भी हुआ और खुशी भी है कि ये सच्चाई बाहर आ रही हैं। सेना में रहते हुए जवान बहुत सी बातें नहीं कह पाते हैं। वैसे शिकायत करने के लिए कई मंच बने हुए हैं लेकिन उनका सही से उपयोग नहीं हो पाता है। इसलिए मजबूरन उन्हें ये रास्ता अपनाना पड़ा।

 

सरकार रक्षा बजट बढ़ाती है और दावा करती है कि उनकी तरफ से सारी सुवधाएं भेजी जा चुकी है। लेकिन अगर फिर भी शिकायत आ रही है इसका मतलब ये सुविधाए जरूर सेना में भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती होगी। अगर सरकार और सेना के आलाकमान चाहते है कि सिस्टम की पोल खोलने वाले वीडियो बाहर ना आए। तो जवानों को सिस्टम के खिलाफ शिकायत करने में लगने वाले डर को खत्म करना होगा। वरना ये जवान अपनी शिकायत को, अपनी आवाज को बाहर पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया को मंच बनाए रखेंगे।

 

नोट- यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। इसका WikiLeaks4India से कोई लेना-देना नही है।

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