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हमें लगता हैं कि सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने दिवाली पर बहुत लोगों का निकाल दिया दीवाला !

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आज पूरे देश में सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पटाखे बैन करने के निर्णय पर ही बात चल रही है। और वहीं दुसरी ओर रेप और मर्डर की खबरें आए दिन आती रहती हैं। देखने वाली बात तो यह हैं कि जिन पटाखों से दिवाली की शोभा है, जिन पटाखों की वजह से बच्चे दिवाली का इंतजार करते हैं सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं पटाखों को बंद करने का फैसला सुना दिया हैं। ऐसा बताया जा रहा हैं कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण को खत्म करने के लिए लिया है। यहां सवाल यह भी उठता हैं कि मंदिरों में आरती सेे जो आवाज उठती है और मस्जिदों में अजान की आवाज जो पूरा दिन लोगों को नमाज अदा करने के बारे में बताती है क्या उससे प्रदूषण नहीं होता।

आपको बता दें कि माना जाता है कि भगवान रामचंद्र जब 14 साल बाद वनवास से घर लौटे थे तब उनका स्वागत दिया जलाकर और पटाखों से किया गया था और उसी के उपल्क्ष में दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। बहुत पुराने समय से ही हर भारतीय दिवाली का त्योहार पटाखे जला कर धूमधाम से मनाता आ रहा है। एक तरफ गौर किया जाए तो दशहरे के त्योहार पर जो रावण के पुतले जलाए जाते है उससे भी प्रदूषण होता है लेकिन फिर भी दशहरा के त्योहार पर कभी इस तरह की बैन नहीं लगी है। सिर्फ एक त्योहार ही नहीं कहीं न कहीं हर त्योहार से प्रदूषण होता ही हैं।

अब अगर बात की जाए दिवाली के अलावा अन्य त्योहारों की तो होली के पर्व को हम रंगों के साथ मनाते हैं। रंग में कई तरह के केमिकल्स पाए जाते हैं जो कहीं न कहीं वायू प्रदूषण फैलाते है। दुर्गा पूजा के समय में बहुत जोर जोर से लाउड स्पीकर बजाए जाते है जिससे ध्वनि प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। और ऐसे ही कई त्योहार है जो ध्वनि प्रदूषण या वायू प्रदूषण फैलाते हैं जैसे गणेश चतुर्थी, नवरात्रे, मुहर्रम और भी कई ऐसे त्योहार हैं जो अलग-अलग रूप से प्रदूषण फैलाते है फिर सिर्फ पटाखों पर ही बैन लगाना कितना सही है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आधी जनता संतुष्ट नहीं हो पा रही है। खासतौर पर वो लोग जो पताखों को बहुत चाव से फोड़ते हैं। अगर देखा जाए तो आज भी हमारे देश में बलात्कार और हत्या जैसी समस्याएं रोजाना सामने आ रही है। मुजरिम के पकड़े जानें के बाद भी कोर्ट द्वारा उसे सिर्फ कुछ ही सालों की सजा दी जाती है और उसके बाद वह फिर शहर में खुला घूमते है और दरिंदगी की सारी हदें पार कर देते हैं। होली के समय पर सबसे ज्यादा बलात्कार और हत्याएं सामने आती हैं लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक यह सब चलता रहेगा और ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और उस समय भी पुलिस वाले कुछ नहीं करते साथ ही उस मामले में आज तक सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला नही लिया है।

उन सभी त्योहार के लिए भी सुप्रीम कोर्ट को कुछ अहम फैसले लेने चाहिए जिन त्योहारों में यह सब कांड होते हैं और साथ ही लड़कियां सुरक्षित महसूस कर सके उसके लिए भी कुछ जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। खैर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की हम आलोचना नहीं कर रहे हैं बस हम इतना कहना चाह रहे हैं कि कोर्ट का ये निर्णय सही जरूर है लेकिन कहीं ना कहीं थोड़ा भेदभाव के नजरिए से देखा जा रहा है।

 

साथ ही आम जन की बात तो अलग है लेकिन उन लोगों का अब क्या होगा जिन्होंने घर की लक्षमी कही जाने वाली अपनी पत्नी के गहने बेच कर पटाखे बेचने के लिए पैसे जुगाड़ किए थे। त्योहार के तुरंत पहले कोर्ट का ये बैन उनका पूरा सामान तो खराब करेगा ही साथ ही उन लोगों का नुकसान कितना होगा जो पूरा साल इंतजार कर रहे थे कि दिवाली पर पटाखे बेच कर कुछ पैसे कमाएं जा जिससे लोग अपने घर को चला पाए।

इस मौके पर एक शेर कहा जा सकता हैं कि

” सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक्सद नहीं
   मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
   तेरे सीने में सही या मेरे सीने में सही
   हो कहीं भी आग. पर आग जलनी चाहिए”

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