मैं एक विधवा हूं और S*X मेरी जरुरत है…

मैं असम के एक छोटे से जिले में रहने वाली 40 साल की विधवा और एक 20 साल के बेटे की मां हूं। इसके अलावा मेरी कुछ सेक्सुअल ख्वाहिशें हैं जो इस रूढ़ीवादी सोच वाले लोगों के लिए शायद गुनाह है। एक कैंसर पीड़ित पुलिस अफसर पिता और बिना मां के चौथी बेटी होते हुए मेरा बचपन आसान नहीं था। मुश्किलों से भरे बचपन ने मुझे सिखाया कि लड़की होना एक पिछड़ी और छोटी सोच वाले समाज में कितना बेकार होता है। मेरा छोटा भाई जो मुझसे सिर्फ एक साल छोटा था उसे पिता और रिश्तेदारों की तरफ से बहुत सारा प्यार मिलता था तब हम बहनों को हमेशा यह महसूस होता था कि हम शायद अनचाही हैं।

अपने पिता के लिए हम हमेशा एक श्राप और एक बोझ की तरह थे जिस वजह से हमारे साथ दुर्व्यवहार भी किया जाता था। इस नकारात्मक माहौल से दूर कुछ था जो मेरी जिंदगी बेहतरीन बनाता था। मेरे आस पास रहने वाले लोगों मुझे अपने बड़े सपनों और एक खूबसूरत भविष्य की उड़ान भरने के लिए एक सबक बनते रहे।

गर्मियों में एक दिन शांत नदी के सामने सूरज की तरफ देखते हुए 10 साल की लड़की ने खुद से वादा किया कि वो जरूर एक बहुत अच्छी मां बनेगी। “मैं नहीं जानती थी कि अच्छी मां क्या होती है लेकिन मुझे और मेरी बहनों को यकीन था कि हमने बचपन में जो देखा उससे वो बिलकुल उल्टा होगा”।

मैं कभी भी अपनी बचपन से बढ़ती जवानी के दिनों को उस तरह से नहीं जी पाई जैसे मेरे बाकि दोस्त जी रहे थे। पेंटिंग करने के मेरे ख्वाब को मैंने अपनी जिंदगी के उन बुरे दिनों में धो डाला जो शायद मुझे एक उज्जवल भविष्य की ओर ले जाते। मैंने अपने इस शौक को छोड़ देना आसान समझा क्योंकि उस शौक को बरकरार रखने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती थी, उनके लिए अपने पिता से लड़ नहीं सकती थी। वो अपने बेटे को एक सुरक्षित भविष्य देना चाहते थे। जिसके लिए वो हर एक-एक रूपया जोड़ते थे। तो उसमें मैं उनसे कैसे वॉटरकलर के लिए पैसे मांग सकती थी।

“मैंने और मेरी बहनों ने अपने मुकद्दर को अपना लिया था और यह मान लिया था कि हम एक अमीर बाप की गरीब बेटियां हैं।”

लेकिन मेरी जिंदगी का यह अंजाम नहीं था। एक चुनौतियों से भरे हुए बचपन के बाद अब बारी थी उम्र के अगले पढ़ाव पर जाने की जो बाहें खोले मेरा इंतजार कर रहा था। जल्दी शादी, नशेड़ी पति, बच्चा और अधूरी पढ़ाई मुझे दिल दिमाग से तोड़ने के लिए काफी था। लेकिन इस बार मैंने ठाना की चाहे कुछ भी हो जाए पर मैं हार नहीं मानूंगी। मुझे 10 साल की उम्र में नदी किनारे खुद से किया हुआ वो वादा याद था। यह मेरे लिए जिंदगी की असल जंग थी। मैंने कभी भी अपने पति से तालाक नहीं लिया क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे। और साथ ही एक अच्छी मां बनने के वादे ने भी मुझे रोक रखा था। लेकिन मैं अपने बच्चे को लेकर अलग जरूर रहने लगी। मैं एक नौकरी करके खाने पीने जितने पैसे जरूर कमा लेती थी। नौकरी के साथ-साथ मैं पढ़ाई भी करती थी और साथ में बच्चे की भी जिम्मेदारी अपने सिर पर लेकर जिंदगी बिता रही थी। मैंने कभी दूसरी शादी नहीं की क्योंकि कानूनी तौर पर तो मैं शादी-शुदा थी। लेकिन फिर मेरे गैर-जिम्मेदार पति की मौत हो गई और मैं विधवा बन गई।

मैं समाज के इस टैग से भाग नहीं पाई लेकिन फिर भी मुझे सुकुन मिला और मुझे जरा भी शर्म महसूस नहीं हुई।”शायद यह सुनने में जरूर बुरा लग रहा होगा। लेकिन मेरी जिंदगी के उन गिरे हुए पलों ने मुझे ऐसा महसूस करने का हक दिया है। अब मैं वो 18 साल की लड़की नहीं हूं जो अपना दर्द, अपने ख्याल या फिर अपनी आवाज को उठा नहीं पाऊं। मै यहां ढोंगी समाज की शिकार नहीं होना चाहती। लेकिन अपने हक की मांग को लेकर लड़ने से मुझे कुछ हासिल नहीं होगा।

आज मैं एक विधवा हूं और यह रूढ़ीवादी समाज मुझे किस नजरिए से देखता है ये भी अलग ही गौर करने वाली बात है। समाज की सोच कहती है कि एक विधवा को अपनी पूरी जिंदगी बिना सेक्स के रहना पड़ेगा। चाहे वो 18 की उम्र में हुआ हो या फिर 50 में उससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। मेरे नजरिए में सेक्स सेहतमंद होता है। लेकिन इस बात से रोज मेरा दम घुटता था।

मै बेशक दोबारा शादी नहीं करना चाहती थी। जिसका कारण मेरा बेटा था लेकिन क्या इसका मतलब यह तो नहीं कि मेरी कोई सेकसुअल जरुरतें नहीं हैं। भारतीय समाज में एक आपकी सोच से मिलने वाला जीवन साथी मिलना एक विधवा के लिए बहुत मुश्किल काम होता है। मुझे समझ नहीं आया कि मैं विधवा होते हुए सेक्स क्यों नहीं कर सकती?

जहां औरतों से लोग सेक्स या उससे जुड़ी बातों पर बात करने से भी हिचकते हैं तो ऐसे में अपनी सोच को लोगों तक पहुंचाने में मुझे कितनी नफरतों से गुजरना पड़ता। लेकिन यह मेरे लिए एक जरूरत थी। मैं अपनी इस जरूरत को मना नहीं करूंगी और ना ही मैं करना चाहती हूं।

एक समझदार और इज्जत करने वाले बेटे की मां होने पर मैं खुद को एक स्मार्ट और कामयाब सिंगल पैरेंट समझती हूं। उम्मीद है ये सोसाइटी भी मुझे ऐसे ही अपनाएं। मैं आम पैरेंट्स से शायद ज्यादा कुशल हूं क्योंकि मैं पैरेंटिंग को समझती हूं। लेकिन मैं भी बहुत बार थकती थी लेकिन तब मैं खुद से किए वादों को याद करती थी।

जब एक विधवा अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभा रही है तो भी क्या समाज को उसकी जिंदगी में दखल देना चाहिए? यह शायद सही समय है जब समाज अपनी मानसिकता बदले। विधवाएं और तलाकशुदा महिलाएं भी आम नागरिक हैं समाज से यही गुजारिश है कि खुद भी जिएं और उन्हें भी उन्के हिसाब से जीने दें।

यह कहानी हर उस महिला के लिए है जो सोचती है कि वो सोचने में गलत है। अगर आप सब कुछ अपने परिवार के लिए कर रहे हैं तो जरूरत नहीं है सोचने कि“लोग क्या कहेंगे”। यह समय है कि आप अपने लिए जिएं ना कि इस बात के लिए कि समाज कैसे जी रहा है।

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