हां मैं एक वेश्या हूं लेकिन अपनी मेहनत से कमाती हूं !

दुनिया मेरे काम को गलत नजर से देखती है लेकिन मै उसी आदर्श समाज कि श्रृंगार हूं, जहां हर तबके के लोग सुकून तलाशने के लिए मेरे पास आते है। फिर भी यही समाज मुझे कभी भी इज्जत नहीं देता है। मैं इसी समाज में रहते हुए भी इस समाज में बेगानी हूं। लोग मेरे पास अपने मलतब के लिे आते हैं और मतलब पूरा होते ही वो मेरे पास से ऐसे भागते है, जैसे किसी ने उन्हें मेरे साथ देख लिया, तो मानो कयामत ही आ जायेगी।  मैं जो काम करती हूं, वो इस दुनिया की नजरों में शायद गलत है लेकिन मेरा दिल कहता मैं सही हूं। भूखे मरने से तो अच्छा है काम करना और मैं भी काम ही करती हूं। और मेरा काम जिस्म बेचना है। यह समाज मुझे भले ही चरित्रहीन कहे लेकिन मैं तब तक चरित्रहीन नहीं हूं जब तक यह समाज पुरूष को चरित्रहीन न समझे, जो रात के अंधेरे में मुझे पागलों की तरह घूरते है।

मेरी कहानी आपको बेबाक कर सकती है, मुझे जानना चाहेंगे आप

इस समाज की नजरों में मैं वेश्या या फिर धंधे वाली लड़की हूं। कुछ पैसों के लिए अपना जिस्म बेचने के लिए तैयार हो जाती हूं। कई बार मेरे ग्राहक मुझे पैसे भी नहीं देते हैं। और मेरा जिस्म उधारी में भी बिकता है। शायद आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन आम तौर पर मेरे साथ उधारी का रिश्ता रखने वाले शहर के बड़े और दबंग तरह के ही लोग होते है या फिर सरकारी अफसर होते है। सुनकर हैरान मत होना आप क्योंकि इन अफसरों को भी मेरी खास जरुरत पड़ती है। और मेरे पास आने पर उन्हें एक साथ कई फायदे हो जाते हैं। पहला फायदा होता है कि उन्हें मुफ्त में मेरा जिस्म मिल जाता है। और दूसरा फायदा होता है कि मुझसे वे पैसे भी एेंठ लेते है।

और सिर्फ इतना ही नहीं, मेरा रिश्ता तो पुलिस वालों से भी अच्छा बन जाता है। हफ्ते में तीन-चार बार तो पुलिस स्टेशन मुझे अपना चेहरा ढक के जाना ही पड़ता है। और कई बार शहर के कुछ बदमाशों को तलाशने के लिे पुलिस वाले मेरे कमरे में भी घुस आते है। और अगर उन्हें बदमाश नहीं भी मिलें तो मैं तो मिल ही जाती हूं। मेरे पास आकर उनका नुकसान कभी भी नहीं होता। इस धंधें में मैं रोज मरती हूं, लेकिन मेरे मरने से मेरे ग्राहकों को मजा आता है।

मेरे जिस्म के खरीददार भी बहुत है 

अगर एक औरत अपनी इज्जत बेचने पर उतर जाती है तो बच्चे,जवान और बूढ़े सब उसके खरीददार बन जाते हैं। तब ना उम्र का लिहाज होता है ना ही अपने ओहदे का, आप ये पूछिए कि कौन नहीं आता है मेरे पास? बच्चे, जवान, अधेड़, बूढ़े सबको मेरी जरूरत होती है। शहर में शराफत के सारे ठेकेदार मेरे कमरे में गड़ी खूंटी पर अपने सफेद कपड़े उतारते हैं। जज, वकील, डाक्टर, मास्टर, इंजीनियर, मंदिर वाले महंत और मस्जिद वाले मौलवी तक भी मेरे कोठे पर आ जाते हैं।

अकसर मैं भी उनके पास चली जाती हूं क्योंकि वहां मुझे नोचने के लिए बहुत सारे भेड़िये पलकें बिछा कर बैठे होते है। और उनकी हैवानियत पर मुझे सिसकियां भरने के पैसे मिलते है। अगर बाजार में उन दरिंदो को मैं न मिलूं, तो न जाने कितनी निर्भया सड़कों पर खून से तर-बतर दिखाई देंगी। मर्द अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए किसी को भी अपना शिकार बना सकता है, फिर चाहे वो पांच साल की बच्ची हो या फिर अस्सी साल की बुढ़िया। उन्हें मतलब होता है तो बस औरत के जिस्म से फिर चाहे उस औरत कि उम्र कितनी भी हो।

मेरे बिकने में खराबी क्या है?

मेरा जिस्म किसी भी मर्द के लिए एक खिलौने से ज्यादा कुछ नहीं होता है। जिसे इस्तेमाल कर उन्हें सुख मिलता है। और अपने सुख के लिए ही वो मुझे पैसा देते हैं। ऐसे में खुद को किसी चीज की तरह बेचने पर भी मैं प्रोफेशनल क्यों नहीं हूं। किसी भी इंसान को अपने काम के बदले में समाज से सम्मान मिलता है, तो मुझे मेरे काम की वजह से नफरत क्यों मिलती है।

ये कैसा दोगलापन है?

अजीब सा लगता है जब घर से बाहर निकलने पर मुझे समाज के ठेकेदारों से गालियां मिलती है। इन लोगों है कि मेरे समाज के मुख्य धारा में आने से इनकी बहन-बेटियां और आने वाली पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी। लेकिन फिर ना जाने क्यूं यही लोग शाम ढलते ही मेरे कोठे की ओर आने लगते है और इंतजार करते है कब मैं इन्हें अपने कमरे में बुला कर प्यार करूं। फिर ना जाने क्यूं उस वक्त मैं इन्हें जन्नत की हूर, परी और अप्सरा लगने लगती हूं।

ग्राहकों की फरमाइश

क्या आप जानते हैं कि मुझे उनकी हर डिमांड पूरी करनी होती है। वो मुझे नहीं बल्कि मेरा वक्त खरीदते हैं। और उस वक्त मैं उन लोगों के लिए सिर्फ एक खिलौना होती हूं। वो जैसा चाहे मुझसे वैसा करवाते है और वो सब करते वक्त मैं बेमौत मरती हूं। मेरी चीख पर मेरे ग्राहक खुश होते है और उन्हें ऐसा लगता है कि उनमें अभी भी मर्दानगी बची हुई है।

सब कहते हैं मैं चरित्रहीन हूं

हर बाजार में दुकानें कुछ ना कुछ बेचने के लिए ही लगाई जाती है। मेरा भी बाजार लगता है। और यहां कुछ दलाल मुझे भी बेचते है। कुछ अच्छे दलाल भी होते है। कमीशन कम खाते है और ग्राहकों से मुझे मोटी रकम दिलाते है। कमीशन खाना हर दलाला का धंधा है और जिस्म बेचना मेरा धंधा है। हां, मैं जिस्म बेचती हूं, तो गलत क्या करती हूं। अगर लोगों को मेरा जिस्म कुछ वक्त के लिए खरीदना गलत नहीं लगता है, तो मेरा जिस्म बेचना आखिर क्यों गलत लगता है। समाज को चाहे जो भी लगे लेकिन मैं गुनाहगार नहीं हूं।

मैंने तुम पर एहसान किया है

दुनिया मेरा एहसान माने या न माने लेकिन मैं ये बात बहुत अच्छे से जानती हूं कि मेरी हर चीख पर बलात्कार थमते हैं, नहीं तो शराफत से भरी इस दुनिया में हर पल चीखती-चिल्लाती लड़कियों की आवाजें सुनाई देतीं, जिनके साथ रेप हो रहा होता है। अगर फौजी सरहद पर हमारे देश की इज्जत बचा रहे हैं, तो मैं भी देश में रहने वाले हर लड़की की इज्जत बचा रही हूं।

लिखने वाले मुझसे पूछते हैं

कैसा लगता है इस धंधे में रहना आपको? आप मेन स्ट्रीम सोसाइटी में कब आएंगी? क्या आपको नहीं लागता आप गलत कर रही है? आप शादी क्यों नहीं करती है? एक दिन में कितना कमा लेती है? क्या आपके साथ कभी जोर-जबरदस्ती हुई है? ये सब करते हुए कितने दिन हो गए आपको? आप छोड़ क्यों नहीं देतीं ये धंधा? आपको जबरन लाया गया है या इस धंधे में आप अपनी मर्जी से आई है? आपको अपने बच्चों के बाप के नाम याद है? एक दिन में कितनी बार सेक्स करना पड़ता है आपको? क्या आप पीरियड्स में भी सेक्स करती है?

और इन सभी सवालों पर मेरा जवाब होता है, “मुझ पर लिखने से आपका धंधा चल जाता है न। आप लोग लिखने के धंधे में हैं न, आप इसे छोड़ क्यों नहीं देते? मैं अपना धंधा क्यों छोड़ दूं? मैं इन सवालों के जवाब क्यों दूं। क्या आपको मुझसे सहानुभूति है? क्या कभी भूल कर भी आपने कभी मेरी समस्याओं पर लिखा है? कभी मुझे समझने की कोशिश की है? क्या मैं कभी आपके प्राइम टाइम डिबेट का हिस्सा रही हूं? क्या आपने कभी मुझे अपने एडिटोरियल पेज पर जगह दी है? क्या आपने कभी मेरा इंटरव्यू छापा है?” कभी-कभी कुछ लोग आते हैं और मेरे बारे में लिखते है लेकिन मैं उन्हें एक धंधे वाली से ज्यादा कुछ लगती ही नहीं। उनकी पूरी कहानी मेरे शरीर के ही इर्द-गिर्द घूमती है।

क्यों घिन आती है मुझे समाज से?

मैं अपनी मर्जी से इस धंधें में नहीं हूं। मुझे इस दलदल में धकेला गया है और अब चाह कर भी मैं आम लड़कियों जैसी नहीं रह सकती हूं। मेरे पैर ऐसे दलदल में है जहां से बाहर निकल पाना मुमकिन नहीं है। मैं ठीक से जवान भी नहीं हुई थी जब मुझे किसी कोठे पर बेच दिया गया था। मुझे एक दिन अच्छे से दुल्हन की तरह सजाया गया था। और उस दिन मेरे साथ जो कुछ भी हुआ उसमें मेरी सहमति नहीं थी। उस दिन से लेकर आज तक मैं अभिशप्त जीवन ही जी रही हूं। मेरा दुख कभी भी कोई नहीं समझ सकता और इस दुनिया ने ही मुझसे मेरी खुशियां छीन ली है, तो फिर मुझे क्यों न घिन आये इस समाज से।

कब समझेगा मुझे समाज?

शायद ये समाज मुझे कभी भी नहीं समझेगा क्योंकि कोई मुझे समझ के भी क्या करेगा। मैं एक गंदा दाग हूं इस सभ्य-समाज की नजरों में। ये समाज मेरे बारे में कुछ भी सोचे, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। अगर ये समाज मेरे साथ इतना गंदा व्यवहार करके भी साफ-सुथरा है, तो मैं भी अतना ही पवित्र हूं जितना यह समाज अपने को पवित्र मानता है।

मैं जो काम करती हूं उस पर मुझे कोई मलाल नहीं है। मुझे भी इस समाज से उतनी ही इज्जत चाहिए जितनी सबको मिलती है। मैं इस समाज से बिलकुल भी अलग नहीं हूं। हां, मैं जिस्म बेचती हूं और यही मेरा प्रोफेशन है, यही मेरा काम है।

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