कुर्बानी की मिसाल पेश कर इस तरह से हर साल मनाई जाती है ईद-उल-जुहा!

history and importance of bakra eid

इसलाम एक ऐसा धर्म है जो अपने बंदों को आजमाता रहता है। जिससे कहा जाता है कि अल्लाह के बंदे बहुत पाक होते है। सच्चा मुसलमान अगर अल्लाह की हर कही बात को मानें तो उससे पाक शख्स कोई नहीं हो सकता। कभी अल्लाह के कहे पर रमजान में महीने भर रोजा रख बंदे खुद के पाक होने की पेशकश करते है। तो कभी कुर्बानी देकर अल्लाह का कहा मानता है।

इस्लाम धर्म में ईद का बहुत महत्व होता है और हर साल दो ईद मनाई जाती है। पहली होती है ‘ईद-उल-फितर’ और दूसरी ‘ईद-उल-जुहा’ जिसे हम ‘बकरीद’ कहते है। ईद-उल-फितर में लोग अपने घरों में सिवाईयां बनाते हैं तो वहीं बकरीद में लोग बकरे की कुर्बानी देते हैं। बता दें कि बकरीद, ईद-उल-फितर के 70 दिन के बाद आती है। बकरीद के दिन मुसलमान बकरे, भैंस या फिर ऊट की भी कुर्बानी देते हैं। लेकिन ज्यादातर लोग बकरीद पर बकरे की ही कुर्बानी देते हैं।

लोग बकरीद से कुछ दिन पहले ही बकरों को खरीदकर अपने घर ले आते हैं और उसे पालते-पोस्ते हैं और फिर बकरीद वाले दिन उसकी कुर्बानी दे देते हैं। इस दिन लोग अपनी आय के मुताबिक लोगों को कुछ दान देते है। ज्यादातर लोगों को इस्लाम धर्म से जुड़े इन त्यौहारों का ज्ञान नहीं होता है और इसी वजह से लोग इन दोनों त्यौहारों के बीच के अंतर को समझ नहीं पाते हैं। और इसलिए आज हम आपको इन दोनों ईद के बीच का अंतर समाझएंगे और साथ ही बकरीद का महत्तव के बारे में भी बताएंगे।

ईद-उल-जुहा (बकरीद)

इस्लाम धर्म का सबसे खास त्यौहार होता है ‘ईद-उल-जुहा’, जिसे पूरी दुनिया में मनाया जाता है। ईद-उल-जुहा को “बकरीद” के नाम से भी जाना जाताहै । बकरीद के दिन धार्मिक मर्यादाओं के अनुसार बकरो की कुर्बानी दी जाती है।

ईद-उल-फितर (मीठी ईद)

ईद-उल-जुहा के साथ-साथ ईद-उल-फितर भी बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार ईद-उल-जुहा से पहले आता है और ईद-उल-फित्र को “मीठी ईद” के नाम से भी जाना जाता है।

दोनों ईद के बीच का अंतर

ईद-उल-जुहा का महत्व-

ईद-उल-जुहा खुशी, विशेष प्रार्थनाओं और मिलने-झुलने का त्यौहार है। सभी मुस्लिम लोग इस दिन एक-दूसरे के साथ उपहार बांटते हैं। ईद-उल-जुहा के दिन हर मुस्लिम घर में खूब रौनक देखने को मिलती है। ईद-उल-जुहा, इस नाम को ज्यादातर अरबी देशों में ही लिया जाता है, लेकिन भारत में इस त्यौहार को बकर-ईद कहा जाता है। और इस दिन बकरो की कुर्बानी दी जाती है।

ईद-उल-फितर

ईद-उल-फितर काफी लंबे समय के रोजो के बाद आती है। इसे रमजान का महीना भी कहा जाता है। यह 29 से 30 दिनों का होता है और इसके अंतिम दिन मीठी सेवइयां बनाकर बांटी जाती हैं। जिन लोगों ने रमजान के पूरे महीने में रोजे रखकर अल्लाह की इबादत की होती है उनके लिए यह सेवइयां इनाम की तरह होती है। ईद-उल-फितर के हिन गरीब लोगों को कुख खास रकम दी जाती है। परिवार में सभी लोगों को कुछ दिया जाता है जिसमें पौने दो किलो गेहूं दिया जाता है। आपको बता दें कि  इस ईद की सबसे ज्यादा खास बात यह है कि इस ईद के आखिरी दिन सबसे पहले मीठा ही खाया जात है, इसलिए इसे मीठी ईद कहा जाता है।

2 महीने के बाद आती है बकरीद

मीठी ईद के ठीक 2 महीने बाद बकरीद आती है। इस्लाम धर्म में बकरे की कुर्बानी देकर मनाया जाने वाला यह त्यौहार हमेशा से ही लोगों की चर्चा का विषय बना रहता है। लेकिन जिन लोगों को बकरीद के त्यौहार की समझ नही होती है वो ये कभी नहीं समझ पाते कि आखिर क्यों बकरों की कुर्बानी देने का महत्व है।

तो इसलिएअ दी जाती हैं कुर्बानी

इस्लाम कहानी के अनुसार एक बार इब्राहीम अलैय सलाम नामक एक व्यक्ति थे, जिन्हें अपने सपनों में अल्लाह का हुक्म हुआ कि वो अपने प्यारे बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। और यह इब्राहीम के लिए एक बहुत मुशकिल इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ उनका बेटे था और दूसरी तरफ अल्लाह का हुक्म। लेकिन उनके लिए अल्लाह का हुक्म ठुकराना अपने धर्म की तौहीन करना था जो उन्हें कभी भी कुबूल नहां था। इसलिए उन्होंने अल्लाह के हुक्म को पूरा करने का निर्णय लिया और अपने बेटे की कुर्बानी को देने के लिए तैयार हो गए। लेकिन अल्लाह रहीमो करीम है और वह अपने बंदे के दिल के हाल को अच्छे से जानते है इसलिए उन्होंने खुद से एक रास्ता खोज निकाला। जब इब्राहीम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे थे तो उसी वक्त फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने तेजी से इस्माईल को छुरी के नीचे से हटाकर उसकी जगह एक बकरे को रख दिया था। और इस तरह इब्राहीम के हाथों बकरे के हलाल होने के साथ ही पहली कुर्बानी हुई थी। और इसके बाद जिब्रील अमीन ने इब्राहीम अलैय सलाम को ये खुशखबरी दी कि अल्लाह ने उनकी कुर्बानी को कुबूल कर लिया है। और तभी से इस त्यौहार पर अल्लाह के नाम पर एक जानवर की कुर्बानी दी जाती है।

ये जानवर नहीं हो सकते कुर्बान

कुर्बानी के लिए खासतौर पर जानवरों की ही कुर्बानी दी जाती है। बकरा या फिर ऊंट ही कुर्बान किए जा सकते हैं लेकिन इसका बात ध्यान रहे कि वह किस रूप या फिर अवस्था में हैं। इसके भी कई नियम और कानून हैं और इन कानून का उल्लंघन करना आल्लाह के नियमों की तौहीन करना माना जाता है। बता दें कि उन जानवरों को कुर्बान नहीं किया जा सकता जिन्हें कोई शारीरिक बीमारी हो या फिर उनके सींग या कान का कोई हिस्सा टूटा हो या फिर वो शारीरिक तौर से बिल्कुल दुबला-पतला हो। केसी भी छोटे जानवर का भी बलि नहीं दी जा सकती। किसी भी जानवर की उम्र कम-से-कम एक साल या फिर डेढ़ साल की होना चाहिए।

कब दी जाती है कुर्बानी?

जानवरों की कुर्बानी कब दी जानी चाहिए इसके लिए भी कड़े कानून हैं। कुर्बानी ईद की नमाज के बाद ही दी जाती है, अगर इससे पहले कुर्बानी देते है तो उस कुर्बानी का कोई मतलब नहीं होता है। कुर्बानी के बाद मांस के तीन हिस्से किए जाते है। एक हिस्सा खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा हिस्से को गरीबों को देने के लिए और तीसरे हिस्से को रिश्तेदाों के लिए। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते है जो सभी हिस्सों को गरीबों में दे देते है।

 

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