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कभी योगा टीचर तो कभी 16 साल की बच्ची, क्या हैं फतवे का माजरा

राफिया एक ऐसी महिला जो बहुत बहादुर है। शायद आज ज्यादा लोग राफिया के बारे में नहीं जानते होंगे। लेकिन राफिया आज सभी कट्टरपंथियों के निशाने पर आ रखी है। आपको बता दें कि राफिया योगा सिखाती है और मुस्लिम धर्म की लड़की है। एक समय राफिया ने रामदेव बाबा के साथ मंच शेयर किया और तभी से उन्हें धमकिया मिलते लगी और कट्टरपंथियों ने निशाना साध दिया। यहा तक की राफिया के खिलाफ फतवा भी जारी कर दिया गया और फतवा जारी करने वाले मोलवी ने जो शर्मनीक बात कही उसे सुनकर आज सभी बहुत गुस्से में है। उस समय मौलवी ने फतवा जारी करते हुए कहा कि तेरी आखिरी नमाज भई नहीं पढ़ी जाएगी। लेकिन राफिया की कुछ ऐसी बड़ी बाते भी है जिसे सुनकर राफिया पर बहुत गर्व होता है।

राफिया ने समाज को योग की तरफ जागृत करने को लेकर कुछ ऐसी बातें कहीं हैं जो आज के समय में सबके लिए जाननी बहुत जरूरी बन चुका हैं। राफिया का कहना हैं कि योग करना हराम नहीं है बल्कि ये तो स्वस्थ शरीर और मन के लिए किया जाने वाला व्ययाम है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि योग को किसी भी धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। बल्कि ये तो आपके ऊपर निर्भर करता है कि योगा करते समय आप ओम का उच्चारण करते हैं या अपने आराध्य का। एक इंसान जो दवाई लेने के लिए कैमिस्ट की दुकान में जाता है तो उसे धर्म या जाती पूछकर दवाई नहीं दी जाती। फिर योग जैसा व्यायाम करने के लिए धर्म कैसे बीच में आ गया। राफिया ने आगे कहा हैं कि इस्लाम धर्म किसी भी योग या अन्य शारीरिक व्यायाम को करने के लिए मना नहीं करता, बस देखना ये होता हैं कि आप उसे किस मकसद से कर रहे हैं। योग करने का मकसद सिर्फ शारीरिक स्फूर्ति औऱ सेहत होना चाहिए ना कि जाती और धर्म के मक्सद से किया जाए।

आपको बता दें कि एक तरफ मुस्लिम समुदाय के लोग राफिया को योग न करने की सलाह दे रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ हिंदू नाम बदलने की सलाह दे रहे हैं। ऐसा इसलिए भी होता है क्योकि सभी लोगों ने धर्म को मजाक बना कर रखा हुआ है और सबसे ज्यादा धर्म का उलंघन भी वहीं लोग करते है जो धर्म के नाम पर ये सब ब्यानबाजी करते है। पहले तो सिर्फ कुछ ही चीजों पर धर्म की बात की जाती थी लेकिन अब तो योगा को भी हिंदू और मुस्लमान बना दिया गया है। क्यों योग को योग ही नहीं रहने दिया जाता, इसे धर्म के खांचे में फिट करने का प्रयास क्यों किया जा रहा हैं। कई लोगों को तो शायद आज तक फतवा क्या होता है यहीं नहीं पता और अगर नहीं पता तो हम आपको बता देते है कि इस्लाम के मुताबिक आसान शब्दों में कहा जाए तो इस्लाम से जुड़े किसी भी मामले पर कुरान और हदीस की रोशनी में जो हुक्म जारी किया जाए वो फतवा है। पैगंबर मोहम्मद ने इस्लाम के हिसाब से जिस तरह से अपना जीवन बिताया उसकी जो प्रामाणिक मिसालें हैं उन्हें हदीस कहा जाता हैं। और यहां इस बात को भी साफ कर देना सबसे ज्यादा जरूरी है कि फतवा हर मौलवी या इमाम द्वारा जारी नहीं किया जा सकता है।

आपको बता दें कि फतवा सिर्फ कोई मुफ्ती ही जारी कर सकता है। और मुफ्ती बनने के लिए शरिया कानून, कुरान और हदीस का गहन अध्ययन सबसे ज्यादा जरूरी होता है। इसका मतलब हैं कि दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम बुखारी जो हर रोज अखबारों, टीवी चैनलों और खबरों में छाए रहते हैं उनके पास फतवा जारी करने का बिलकुल भी अधिकार नहीं है। नाहिद आफरीन ने भी बताया हैं कि उनके घर पर कुछ लोगों द्वारा एक लिफाफा पहुंचाया गया था जिसके अंदर एक परचा था। साथ ही आपको बता दें कि शरिया कानून को पूरी तरह से मानने वाले देशों पर ही फतवे का कोई असर हो सकता है क्योंकि वहां इसे कानूनन लागू कराया जा सकता है। क्योंकि भारत जैसे देश में इस्लामी कानून को लागू करवाने के लिए किसी भी तरह की कोई भी व्यवस्था नहीं है इसलिए फतवे भी बेमानी बनकर बैठे है। इतना ही नहीं इस तरह की सभी अफवाहों को कई लोगों ने मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश के तरीके से भी देखा है। वैसे तो पहले भी ऐसी अफवाहें फैलाई जाती रही हैं। हालांकि इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि कुछ मौलवियों ने इसका गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जैसे एक मामले में बलात्कार हुई एक महिला को आदेश जारी कर ससुर से ही शादी करवा दी गई।

इसके साथ ही आपको बता दें कि कुछ दिनों पहले टीवी चैनलों की रिपोर्ट ने चीख-चीखकर दर्शकों को बताया था कि असम के कम से कम 46 मौलवियों ने एक 16 साल की लड़की के शो के खिलाफ फतवा जारी कर दिया है। उसके बाद पुलिस पूरी तरह से यह जांच करने में जुट गई थी कि मामला कहीं यह मामला इस्लामिक स्टेट से तो नहीं जुड़ा है, क्योंकि कथित तौर पर युवा गायिका नाहिद आफरीन ने हाल ही में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ गाना भी गाया था। वहीं नाहिद के परिवार वालों से बातचीत में पता चला कि यह फतवा नहीं था बल्कि कुछ मुसलमानों ने एक परचे की मदद से कहा था कि इस तरह के म्यूजिकल प्रोग्राम को पूरी तरह से बायकॉट कर देना चाहिए।

आपको बता दें कि जाती और धर्म के नाम पर भेदभाव करना सबसे ज्यादा धर्म का उलंघन करना होता है। इस्ताम में न तो तीन तालाक को गलत तरीके से दिया गया है और न ही फतवे को गलत तरह सले दिया गया है। ये सिर्फ कुछ लोगों की घटिया सोच है जिसे कोई भी नहीं बदल सकता। जो लोग धर्म के ठेकेदार बन कर घुमते है वहीं धर्म के खिलाफ रहते है।

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