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खुलासा: इतने सालों से मूर्ख बनाते आ रहे हैं मौलावी, इस्लाम में औरतें भी कर सकती है ये काम जिसके लिए थी सिर्फ पुरुषों को इजाजत…

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औरते है आजाद

आज मुस्लिम महिलाएं इतनी आगे बढ़ गई है कि वह अपने साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। मुस्लिम महिलाओं को अपने साथ होने वाली तीन तलाक सरीखी नाइंसाफी बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं है और साथ ही वह इस कुप्रथा का बोझ अपने कंधे पर ढोने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है। कई लोगों के मन में सवाल भी उठ रहा होगा कि इतने समय बाद ही महिलाओं ने आवाज क्यों उठाना शुरु किया पहले क्यों नहीं। इसका जवाब बी हन दे देते हैं कि यह आवाज महिलाओं ने कुरान के अध्यन के बाद उठाई है क्योंकि कुरान में तीन तलाक जैसी कोई भी चीज नहीं है।

 

औरतों को भी वह सभी हक है जो आदमियों के पास है और कुरान में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि तलाक सिर्फ पुरुष ही दे सकते है। सब को अपनी खुशी के साथ जीने का पूरा हक हैं यह बातें सामाजिक कार्यकर्ता नाइस हसन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी आने के बाद कही जिसमें यह साफ कहा गया की तीन तलाक महिलाओं के साथ क्रूरता है।

 

दलाव जरूरी

आज तक पूरा इतिहास बदलाव पर टिका है और बदलाव हमेशा होता रहेगा। नाइस का कहना है कि मुस्लिम कानून के विकास की तरफ नजर डालें तो 632 ई अर्थात मुहम्मद साहब के निधन के बाद से लेकर 661 ई तक के 29 वर्ष के कालखंड में भी कानून में अलग-अलग तरह के कई बदलाव किए गए है। उस समय में कानून के स्रोत सिर्फ कुरान और सुन्ना को ही माना जाता था। फिर खलीफा उमर साहब ने गैरधार्मिक और लौकिक वादों के लिए एक काजी नियुक्त किया गया था। उस समय यह भी निर्धारित कर दिया गया था कि भारतीय कानून सर्वशक्तिमान हैं और कार्यपालिका भी कानून के अधीन ही रहेगी। इसके बाद 661 से 900 के समय में कई अहम बदलाव किए घए है जिसे सिर्फ तथाकथित मौलानाओं के कहने से ही खारिज नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम धर्मगुरु और ऐश्बाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने साफ तौर पर कहा है कि महिलाएं भी अपने शौहर को तलाक दे सकती है कुरान में ऐसा कही भी नहीं कहा गया है कि सिर्फ पुरुष ही अपनी बेगम को तलाक दे सकते है। वो बात अलग है कि हमारे देश में महिलाओं को कम ही जानकारी है कि वह भी अपने शौहर को तलाक दे सकती है और आज महिलाओं को सही जानकारी न होने की वजह से इतना दुःख झेलना पढ़ रहा हैं। क्योकि इस्लाम के मुताबिक शादी सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट है, जन्म जन्म का बंधन नहीं। इस्लाम के मुताबिक शादी के समय पति को एक तयशुदा रकम (मेहर ) के रूप में निकाह (शादी) हो जाने के बाद देना होता हैं। दोनों तरफ के लोग जब चाहे एक-दूसरे को तलाक देकर शादी के बंधन से मुक्त हो सकते है।

तीन तलाक कानून का अधिकार अगर मर्दो के पास है, तो औरतों के पास भी ऐसे कई कानून है जिनकी मदद से वह अपनी शादी को खत्म कर सकती है और अपने शैहर से दूर हो सकती है। ज्यादातर ऐसा ही देखा जाता है कि महिलाएं अपने पति को नहीं छोड़ती वह अपने पति के साथ किसी भी हाल में रहने के लिए तैयार रहती है। लेकिन पुरुष अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आता | इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का कहना है कि औरते शुरु से ही कोर्ट कचहरी के चक्कर से हमेशा दूर रहना चाहती हैं और साथ ही शिक्षा का भी अभावहोता हैं। जिसकी वजह से महिलाओं के पास सारी परेशानियों को झेलने के अलावा और कोी रास्ता नहीं होता।

‘तफ्वीद-ए-तलाक’ में कहा गया है कि एक औरत अपने अधिकारों को पूरी तरह से सुरक्षित रख सकती है और एक तरफा तलाक से खुद का बचाव करने में भी सक्षम होती है। मौलाना फरंगी महली का कहना है कि चाहे हम मुस्लिमानों के धर्म की बात करे या फिर हिन्दुओं की आमतौर पर ऐसा देखा जाता हैं कि शादी के शुभ अवसर पर तलाक की बात करना तो दूर तलाक के बारे में सोचना भी अशुभ मानते हैं अगर एक औरत चाहे तो यह शर्त लगा सकती है। सही कहू तो इसका प्रयोग बहुत ही कम होता है। क्योकि जीवन के अच्छे बुरे का एहसास बाद में चलता हैं।

तलाक का दूसरा तरीका है” खुला”। खुला के तहत अगर मुस्लिम महिला चाहे तो अपनी तरफ से अपने शौहर को तलाक दे सकती है। ‘खुला’ में तलाक की प्रक्रिया सिर्फ महिलाओं द्वारा ही की जाती है। महिलाएं इस विकल्प का थोड़ा ही प्रयोग करती हैं जिसमें ज्यादातर मामले शारीरिक यातना या फिर ठीक से ख्याल ना रखने के होते हैं।

फस्ख-ए-निकाह में भी अगर एक महिला चाहे तो अपने शौहर से तलाक ले सकती हैं इसके लिए महिला को एक प्रार्थना पत्र दारुल कजा में देनी होगी और वहां के बुलावे पर अगर पति हाजिर नहीं होता है तो भी निकाह को औरत की मंशा के अनुरूप ही खत्म कर दिया जाता है।

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