कांंग्रेस के 3 ऐसे अस्त्र जो शाह और मोदी के सामने हुए फेल…

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एक बार फिर बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह का करिश्मा देखने को मिलता है। कर्नाटक में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। ऐसा माना जा रहा था कि कर्नाटक में सिद्धारमैया एक बार फिर से पार्टी की विजय पताका फहराने में सफल साबित होंगे। लेकिन कांग्रेस और सिद्धरमैया की रणनीति को बीजेपी ने धराशायी कर दिया है।

कांग्रेस और बीजेपी ने कर्नाटक के चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, एक तरफ जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव प्रचार कर रहे थे तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के लिए ताबड़तोड़ रैलियां की।

सिद्धारमैया पर भारी शाह

कर्नाटक चुनाव से पहले कांग्रेस ने कई ऐसी रणनीतियां बनाई थीं, जिसकी वजह से उसका पलड़ा भारी लग रहा था। खुद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस बात का दावा कर रहे थे कि वो उनकी पार्टी प्रदेश में एक बार फिर से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी। लेकिन इन सब के बीच में सिद्धारमैया की कुछ खास रणनीतियां उनपर भारी पड़ी है और बीजेपी ने कांग्रेस की रणनीति का माकूल जवाब दिया। इसमें सबसे बड़ी रणनीति के रूप में कांग्रेस ने चुनाव से पहले लिंगायत कार्ड खेला था।

लिंगायत कार्ड कांग्रेस को इस बात का भरोसा था कि प्रदेश में लिंगायत कार्ड उसके लिए काफी कारगर साबित होगा। जिसके चलते पार्टी ने चुनाव के ऐलान से पहले लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग धर्म का दर्जा देने के साथ उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव पास किया गया है। हालांकि कांग्रेस को लिंगायत कार्ड का कुछ खास लाभ नहीं हुआ है और अधिकतर लिंगायत बाहुल्य इलाकों में बीजेपी को बढ़त मिली।

कन्नडा गौरव

लिंगायत कार्ड के अलावा कांग्रेस ने कर्नाटक में कन्नड गौरव का झंडा बुलंद किया था। इसका मुख्य उद्देश्य था कि कन्नड़ भाषी लोगों को एकजुट कर उनका समर्थन हासिल किया जा सके। सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि वो राज्य के अलग झंडे को मंजूरी दें। पीएम मोदी ने खुद को कन्नाडिगा बताया था जिसके बाद सिद्धारमैया ने पीएम से अपील की थी कि कन्नाडिगा का मतलब होता है खुद राज्य का अलग गीत, ध्वज हो, क्या वो ऐसा करके खुद को असल कन्नडिगा साबित करेंगे। लेकिन सिद्धारमैया का ये दांव भी इस चुनाव में उनके काम नहीं आया।

AHINGA कार्ड

कर्नाटक में जातीय समीकरण को साधने के लिए कांग्रेस ने अहिंगा कार्ड खेला था, जिसके तहत अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और दलितों को एकजुट करने की सोशल इंजीनियरिंग पार्टी ने शुरू की थी। लेकिन जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का दबदबा था वहां भी पार्टी को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा है और पार्टी को काफी सीटों का इन जगहों पर नुकसान हुआ। यहां पर गौर करने वाली बात ये है कि पिछले 33 सालों में किसी भी पार्टी ने कर्नाटक में दोबारा सरकार बनाने में सफलता हासिल नहीं की है।

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