इस बड़े मंदिर का शिवलिंग धस रहा है पाताल में, अंजाम भुगतने के लिए हो जाइए तैयार

पूरी दुनिया में भारत को सबसे श्रद्धालु देश माना जाता है, ऐसा इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहचान ही देवी-देवताओं वाले देश के तौर पर की जाती है। भारत ही एक ऐसा देश है जहां अलग-अलग धर्म के लोग रहते है और उनके अपने-अपने भगवान हैं। भगवान होंगे तो मंदिर बी होंगे ही और ऐसे ही भारत देश में कई मंदिर भी है, जहां भगवान के भक्त उनके दर्शन करने के लिए बड़ी मात्रा में पहुंचते हैं। उन्हीं धर्मों में एक धर्म है जिसे हम सभी लोग हिंदू धर्म के नाम से जानते है, जिसके अनुयायियों की संख्या भारत में सबसे अधिक है, लिहाज हिंदू धर्म धर्म से जुड़े मंदिरों की संख्या भी बाकी मंदिरों से काफी अधिक है।

हिंदू धर्म में एक भगवान है जिनके लाखों भक्त है और इस लाखों की संख्या में सबसे ज्यादा युवा उनकी पूजा करते है। उन्हें भगवान शिव जी, भोलेनाथ, शिव शंकर के साथ कई अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हमारे भारत देश में भोलेनाथ के कई मंदिर है, जहां खास तौर पर शिवलिंग को पूजा जाता है। ऐसे में आज हम आपको उस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसको लेकर लोगों का मानना है कि यहां शिवलिंग पाताल लोक में घुंसा हुआ है।

 

कई समय से बताया जाता है कि शिव जी का यह मंदिर हिमालय की गोद में बसे एक ऐतिहासिक गांव में कई सालों पहले बनाया गया था। इस मंदिर को लेकर भारत देश के लोगों का मानना है कि मंदिर का शिव लिंग धरती पर बढ़ रहे पापियों के बढ़ते पाप की वजह से ऐसा हो गया है, ऐसे में उस दिन शिवलिंग पाताल लोक में समा जाएगा जिस दिन पापियों का पाप हद से ज्यादा बढ़ जाएगा। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा घाटी की गोद में बसे हेरिटेज गांव परागपुर से लगभग आठ किलोमीटर दूर है।

 

मिली जानकारी के मुताबिक इस शिव मंदिर को भगवान भोलेनाथ का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है, जिसे मूल रुप से श्री महाकालेश्वर जी के नाम से जाना जाता हैं। इस मंदिर के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि इस मंदिर में पाताल लोक के लिए एक गुप्त रास्ता भी जाता है। जिसकों लेकर लोगों की मान्यता है कि इसी रास्ते से ऋषिमुनि पाताल से होकर कैलाश पर्वत की तरफ आते जाते थे, जहां वे शिवजी की तपस्या किया करते थे।

आपको बता दें कि मंदिर का एक बड़ा हिस्सा प्राचीन गुंबदों और आकर्षक मंदिर श्रृंखला में है, जो सभी लोगों का मन शांत करता है और सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है।  व्यास नदी के सौम्य जल प्रवाह भी इस मंदिर को छूते हैं। जानकारों के मुताबिक इस मंदिर का संबंध हिन्दू धर्म के दोनों महाकाव्यों (महाभारत और रामायण) के साथ भी जोड़ा जाता है।

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