शक्तिमान की दूसरी बरसी पर शक्तिमान की कहानी शक्तिमान की जुबानी

हम आज एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां जानवरों की कोई कद्र नहीं है। हर इंसान को दर्द होता है लेकिन एक जानवर को भी उतना ही दर्द होता है ये कोई नहीं सोचता। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि आज लोग मरने के बाद इंसान को याद नहीं करते तो जानवर तो बहुत दूर की बात है और मैं आज आपकों एक जानवर की बात बताने जा रहा हूं जो 2 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कहकर चला गया। उसे कैसा लगा होगा यह मैं आज सभी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा।

सफेद गोरा-चिट्टा, पैनी नजरें, कसा हुआ बदन और दोनों कान सीधे खड़े कुछ ऐसा ही तो था मैं। मेरी उर्म सिर्फ 14 साल की थी और बहुत मेहनत की थी मैंने यहां तक पहुंचने के लिए। मुझे भी ट्रेनिंग करते समय अपने मास्टर से मार खानी पड़ती थी। बस प्यार भी बहुत मिला इसलिए मास्टर की मार मेरे लिए जिंंदगी में कोई मायने नहीं रखती थी। मेरे हौसले बहुत बुलंद थे इसीलिए मेरे इरादे भी पक्के ही थे। उत्तराखंड मतलब देव भूमी से मुझे बहुत लगाव था और इसी वजह से उत्तराखंड के लोगों की सेवा करने के लिए मैंने खुद को शक्तिशाली बनाया। ताकि अगर कभी भी किसी को भी जरूरत पड़े तो मैं हमेशा उत्तराखंड के लोगों के लिए मुस्तैदी से डटा रहूं। मुझमें यहीं खूबी देख कर मुझे उत्तराखंड पुलिस के घुड़ दस्ते में भर्ती करा दिया गया था। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे मैं भी जवान होता जा रहा था, हर रोज मेरा मास्टर मुझसे कठिन ट्रेनिंग और एक्सरसाइज़ करवाता था और मैं भी खूब दौड़ता था, पसीना बहाता था। क्यों न बहाता उत्तराखंड के लोगों से मुझे इतना प्यार जो था। उनकी अच्छे से सेवा करने के लिए ही तो मैंने जन्म लिया था।

 

मेरी नस्ल हिंदुस्तान में बहुत कम है। Kathiawari mare नस्ल के नाम से ही मुझे पहचाना जाता था और मैरी दूसरी पहचान Uttarakhand mounted police की मेरी नौकरी है। मेरी तीसरी ख़ासियत कीमत थी, क्योंकि अब मेरी एक टांग नहीं रही और अब मैं विकलांग हो गया हूं इस वजह से मेरी कीमत घट गई वरना मेरी कीमत करीब 7 लाख रुपये के आस-पास होती। देश के 16 राज्यों में मुझ जैसे अच्छी और खत्म होती नस्ल के सिर्फ हजार ही घोड़े शेष बचे है और वह सभी भी मेरी ही तरह माउंटेड़ पुलिस में तैनात है। उन्हीं 1000 घड़ों में से मैं भी एक था। मैं था अब नहीं रहा क्योंकि मुझे जिन लोगों की हिफाजत करनी थी उन्हीं लोगो ने मेरी जिंदगी खत्म कर दी।

मैं मानता हूं कि मैं कुछ भी बोल नहीं सकता लेकिन सुन -समझ और देख सकता था। अगर मैं चांहता तो अपनी मजबूत टांगों की मदद से मुझ पर जुल्म ढाने वाले पर लातें बरसा कर उन्हें मार सकता था, लेकिन मेरा कर्तव्य ही मेरे लिए सबसे अहम था और दूसरा कारण यह था कि मुझे उत्तराखंड के लोगों से बहुत प्यार था। इसी वजह से मैं खामोश रहा और सब जुल्म चुपचाप सहता रहा ताकी आगे जाकर लोग मुझे भी सम्मान दे सकें। लेकिन मुझे सबसे ज्यादा दर्द इस बात से हुआ कि जिन लोगों से मैंने अटूट प्रेम किया, जिनकी हिफ़ाज़त करने के लिए मैंने अपना सारा जीवन दाव पर लगा दिया उन्हीं लोगों ने मुझे सिर्फ एक जानवर समझा, हां एक बेबस और लाचार जानवर। जो उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था। आज मुझे लगता है शायद उन्होंने मुझे ठीक ही समझा था।

मैं खामोश था क्योंकि मुझे यकीन था कि वह सब मेरे अपने लोग थे, इसीलिए मैं उन लोगों की भीड़ में बिना डरे खड़ा रहा। उसी समय अचानक मसूरी के विधायक गणेश जोशी मेरी तरफ डंडा लेकर आए। उस समय मेरे मन में थोड़ा सा खौ़फ पैदा हो गया, लेकिन सब मेरे अपने ही थे फिर ख़ौफ़ कैसा इसलिए मैं तब भी चुपचाप ही खड़ा रहा। लेकिन तभी मेरे किसी अपने ने मुझ पर गुस्सा किया और शायद वह हल्द्वानी के प्रमोद वोरा थे।

इस वीडियो में और कोई नहीं बल्कि प्रमोद वोरा ही हैं जिन्होंने मेरी लगाम खींच दी। तभी मैं अपना संतुलन खो बैठा और जमीन पर गिर पड़ा। मैं तो आपको शब्दों में बता भी नहीं सकता कि जमीन पर गिरने के बाद मुझे कितना दर्द हुआ। बस मैं अपने अपनों को देखता रहा, वो ही अपने जिन्हें मैं हमेशा अपना मानता था और उन्ही लोगों से उम्मीद करता था कि शायद वो मुझे कभी भी एक निरीह जानवर नहीं समझेंगे। मेरे पैर में बहुत दर्द था और खून से लथपथ भी हो चुका था। फिर हुआ ये कि मैं मेरे अपनों के बीच बस एक तमाशा बनकर रह गया था। मैं सच में जानवर ही था क्योंकि मैं हमेशा लोगों को अपना समझता था।

उसके बाद मुझे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया और डॉक्टरों की पूरी टीम ने मेरे पैरों को सही करने की पूरी कोशिश की लेकिन मैं खड़ा नहीं हो पाया। मेरे पैरों से लगातार खून की धारा बह रही थी और मुझे शरीर में infection हो रहा था। डॉक्टरों ने भी मुझे बचाने की बहुत कोशिश की थी लेकिन Infection का खतरा बढ़ता जा रहा था जो मेरी जान भी ले सकता था। इस बात में कोई शक नहीं है कि डॉक्टरों ने मुझे बचाने के लिए मेरे पैर का Operation करना ही सही समझा और अंत में मेरा जख्मी पैर ही काट दिया। पैर कांटने से मैं बच तो गया था लेकिन मेरी जिंदगी मेरे अपनों की वजह से ही अब एक नर्क जैसी बन गई है। फिर भी मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं।

मैं जानवर हूं यह बात तो सच है लेकिन आप लोगों की तरह मेरे पास भी एक दिल है जिसमें दर्द है और पीढ़ा है। कोई बात नहीं, शायद आप लोग नहीं समझ पाओगे कि एक बेज़ुबान का दर्द क्या होता है क्योंकि आप इंसान हो। शायद मेरा दर्द थोड़ा कम हो जाता, अगर इंसानियत थोड़ी सी जिंदा होती। ये दर्द तब शायद और भी कम हो जाता, जब कोई हिम्मत करके इंसानियत का फर्ज अदा करते हुए अपनी गल्ती मान लेता और मुझसे कहता कि शक्तिमान तुम हमारे लिए हमारी जिंदगी हो, तुम जानवर नहीं तुम हमारे अपने हो और हमारी ही गल्ती की वजह से तुम्हें अपना पैर गंवाना पड़ा इस वजह से मैं मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा। कोई अगर इतना भी कह देता तो शायद मेरे मन की हर पीढ़ा समाप्त हो जाती। लेकिन आप लोग तो इंसान हो, आप कुछ भी कर सकते हो। बस अपनी ग़ल्ती नहीं मान सकते, सिर्फ इतना ही फर्क है मुझमें और आपमें। क्योंकि मैंने आप लोगों को कबका माफ कर दिया…आपका शक्तिमान…!!!

ये थी वो कहानी जो आज भी लोगों को शर्मिंदा करने के लिए काफी है। जानवरों के अंदर भी एक दिल है और शायद हम सभी लोगों से काफी प्यारा दिल है जिसे हम लोग कभी भी नहीं पहचान सकते क्योंकि हम लोग तो इंसान है न। पर एक कड़वा सच यह है कि जानवर इंसानों से लाख गुना बहतर है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.