BLOG : खुदा बड़ा या राम इसी असमंजस में फंसा है इंसान | blogs

BLOG : खुदा बड़ा या राम इसी असमंजस में फंसा है इंसान

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हम भारत के लोग जो कहने को तो बहुत सेक्यूलर है लेकिन पूरे विश्व में हमसे बड़ा पाखंडी शायद ही कोई और हो। हम विकास की बात करते हैं, न्यूक्लियर मिसाइलों की डील करते हैं, हम बात करते हैं देश को विश्व की सबसे बड़ी ताकत बनाने की लेकिन वहीं हम अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार बैठते हैं। भारत को तबाह करने के लिए किसी आतंकवाद, चीन, पाकिस्तान या किसी बाहरी शक्ति की जरूरत नहीं हैं। हम इतने बदनसीब लोग हैं कि हम एक दूसरे से ही लड़कर कट जाएंगे। एक शेर बहुत सही कहा गया है कि हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था हमारी कश्ती भी वहीं डूबी जहां पानी कम था।

 

जिस सेक्यूलर मुल्क को हम धरती की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति कहते हैं उसी मुल्क में हम अपने पाखंड धर्मों की जंग में उलझे रहते हैं। चलिए नहीं कहते कि धर्म को ना मानिए लेकिन जरा यह भी तो बताइए की कौन सा धर्म माने और कौन सा नहीं। हमारे राष्ट्र को देशभक्त लोग हिंदुस्तान कहते हैं जिसे हम सीधे शब्दों में माने तो हिंदुओं का स्थान। तो यहां एक सवाल है कि अगर हम हिंदुस्तानी हैं और हम सब हिंदू हैं तो इसका जिक्र संविधान में क्यों नहीं किया गया? चलिए कोई बात नहीं अंबेडकर साहब लिखना भूल गए होंगे। लेकिन उनकी इस चूक को आज तक सुधारा क्यों नहीं गया? लगभग 67 साल कानून को बनें हो गए इतने सालों में किसी भी सरकार ने यह क्यों नही किया कि भारत में जो भी रहेगा वह हिंदू ही होगा हर कोई हमेशा यह क्यों कहता है कि इस देश में संविधान से ऊंचा कुछ नहीं हैं। तो अगर इस देश में संविधान ही सब कुछ है तो फिर धर्म क्या है?

 

1984 में कत्लेआम हुआ, 1993 में बाबरी मस्जिद ढहाई गई, 2002 में ट्रेन में ब्लास्ट और फिर पूरे गुजरात का दंगो की आग में झुलस जाना, केरल से यूपी, गुजरात हो या बंगाल देश का कोई राज्य हो या फिर कथित धर्म हो कोई भी इससे अछुता नहीं है। चलिए आप अपने धर्म को बचाना चाहते हैं माना इस बात को भी पर क्या आपका धर्म यह सिखाता हैं कि अपने भगवान के लिए इंसानियत त्याग दीजिए। उन मासूमों की क्या गलती होती है आपके इन सांप्रदायिक दंगों में जो बेवजह ही मर जाते हैं। हजारों की संख्या में बर्बाद होने वाले वह लोग जो इस देश में बिना किसी कसूर के रहते हैं उनकी क्या गलती होती है। क्यों यह सांप्रदायिक हिंसा औरतो को विध्वा बना देती है किसी औलाद के सर से बाप का साया छिन जाता है, तो किसी से उनकी छत। हमारे मुल्क में हर धर्म के लोगों को रहने की बराबर आजादी हैं। ऐसा हमारे देश का संविधान कहता है।

 

हिंदू धर्म में दुर्गा को पूजने के लिए दिन रात एक कर देते हैं, नवरात्रों में व्रत रखते हैं लेकिन जब भ्रूण हत्या या रेप जैसे कदम उठाते हैं तब क्यों जहन में दुर्गा का ध्यान नहीं आता। इस्लाम में कहा गया है कि इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं हैं तो फिर क्यों इंसानियत को छोड़ धर्म पहले आ जाता है। सरस्वती को पूजने वाले लोग क्यों आरक्षण के नाम पर स्कूल ही जला देते हैं? लोगों को गाय का मीट रखने के शक पर ही क्यों मार दिया जाता हैं। करोड़ो रूपए के गाय के चारा घोटाले में यादव ही क्यों जुड़े है जो कहते है कि गाय हमारी माता हैं।

 

चाहे गीता हो या कुरान, अल्लाह मानिए या कृष्ण अगर उनका अस्तित्व कभी था और लोग उनकी बातों को मानते हैं तो फिर क्या गीता में या कुरान में लिखा गया हैं कि अल्लाह को मानिए कृष्ण को नहीं। अपने धर्म को ऊंचा उठाने में लोग इतना जुट गए हैं कि धार्मिक किताबों की जंग में उनमें लिखी बातें ही भूल गए हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई सब के सब मेरे ही भाई दीन मजहब के चक्कर छोड़ो एक ही मानों दीन ए इलाही यह बात इकबाल सफीर ने अपने एक शेर में कही लेकिन आज क्यों भाई ही भाई के खून का प्यासा बना बैठा है। गालिब साहब ने बहुत सही बात कही हैं कि ‘जब की तुझ बिन नहीं कोई मौजूद फिर यह हंगामा ए खुदा क्या है।’

 

इंसान के लिए धर्म बने समझ आता है पर क्यों आज धर्म के लिए इंसान बन रहे हैं? धर्म से इंसान की पहचान करना 21वीं सदी में मुर्खता ही तो कहेंगे। खुदा कहे या ईश्वर अगर वह कभी थे तो यकीनन उन्होंने यह तो नहीं चाहा होगा कि अल्लाह और राम के नाम पर इंसान ही इंसान को काटे। अगर खुदा या भगवान की सबसे खूबसूरत पेशकश इंसान है तो उसकी सबसे प्यारी चीज को उसके ही नाम पर नष्ट कर रहे हैं।

 

परमात्मा को धूंधने के लिए लोग इस हद तक गिर गए कि भलाई छोड़ जंग छिड़ गई लेकिन क्यों लोगों ने स्वामी विवेकानंद की कही बात पर अमल नहीं किया कि “हम जितना ज्यादा बाहर जाए और दूसरों का भला करें हमारा हृद्य उतना ही शुद्ध होगा और परमात्मा उसमें बसेंगे।” भगवान मानना गलत नहीं हैं लेकिन भगवान के नाम पर इंसान बांटना सही नहीं है। अपनी बातों को मैं एक बाल कविता की कुछ पंक्तियों के साथ खत्म करना चाहुंगा - मंदिर-मस्जिद-गिरजाघर ने बाँट लिया भगवान को। धरती बांटी, सागर बांटा, मत बांटो इंसान को। साथ उठें सब तो पहरा हो-सूरज का हर द्वार पर। हर उदास आँगन का हक हो-खिलती हुई बहार पर।

 

यह लेखक के अपने विचार है Wikileaks4India का इससे कोई लेना देना नहीं हैं

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